प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जनता को दी गई ‘लॉकडाउन जैसे संयम’ की सलाह पर राजनीतिक घमासान शुरू हो गया है। कांग्रेस नेता और विपक्ष के चेहरा राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री के इस संबोधन पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। राहुल गांधी ने इसे प्रधानमंत्री की ‘नाकामी का सबूत’ बताते हुए आरोप लगाया कि सरकार अपनी विफलताओं की जिम्मेदारी हर बार जनता के कंधों पर डाल देती है।
राहुल गांधी का प्रहार: ‘यह उपदेश नहीं, नाकामी है’
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया के माध्यम से प्रधानमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि जब भी देश किसी संकट का सामना करता है, प्रधानमंत्री आगे आकर जनता को अनुशासन का पाठ पढ़ाने लगते हैं। उन्होंने कहा, “यह कोई सलाह या उपदेश नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि सरकार व्यवस्था को संभालने में विफल रही है।” राहुल गांधी का तर्क है कि जनता पर पाबंदियों जैसी बातें थोपना सरकार की कूटनीतिक और प्रशासनिक हार को छिपाने का एक तरीका है।
जिम्मेदारी से बचने का आरोप
विपक्ष का मुख्य आरोप यह है कि देश में बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर उपजे तनाव के लिए सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं। राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री को जनता से त्याग की अपेक्षा करने के बजाय यह बताना चाहिए कि उनकी सरकार इन संकटों को हल करने के लिए क्या ठोस कदम उठा रही है। उन्होंने सवाल किया कि “हर बार जिम्मेदारी जनता पर ही क्यों डाली जाती है? सरकार अपनी जवाबदेही कब तय करेगी?”
‘लॉकडाउन’ शब्द पर आपत्ति
प्रधानमंत्री द्वारा ‘लॉकडाउन’ जैसे अनुशासन के शब्द प्रयोग पर राहुल गांधी ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने याद दिलाया कि पिछले लॉकडाउन ने देश की अर्थव्यवस्था और गरीबों की कमर तोड़ दी थी। राहुल के अनुसार, ऐसे शब्दों का प्रयोग जनता के बीच डर पैदा करने वाला है और यह दर्शाता है कि सरकार के पास स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कोई नया दृष्टिकोण नहीं है।
कांग्रेस का आधिकारिक स्टैंड
कांग्रेस पार्टी ने कहा कि प्रधानमंत्री का संबोधन भटकाने वाला था। पार्टी के अनुसार, इस समय देश को स्पष्ट रोडमैप और आर्थिक राहत की जरूरत है, न कि घर में बैठने की सलाह की। कांग्रेस ने मांग की है कि सरकार को वर्तमान भू-राजनीतिक और आर्थिक संकट पर संसद में विस्तृत चर्चा करनी चाहिए।
प्रधानमंत्री की अपील के पीछे के कारण
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तेलंगाना में दिया गया यह संबोधन देश की आर्थिक सुरक्षा और विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) को बचाने के लिए एक ‘आपातकालीन ब्लूप्रिंट’ के रूप में देखा जा रहा है। पश्चिम एशिया के अस्थिर हालातों ने भारत जैसे बड़े आयातक देश के सामने नई चुनौतियां पेश कर दी हैं। प्रधानमंत्री ने कंपनियों से दोबारा Work From Home को प्राथमिकता देने का आग्रह किया है। इसके पीछे मुख्य उद्देश्य पेट्रोल और डीजल की खपत को कम करना है।
- भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है। मिडिल ईस्ट में तनाव के कारण तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार जा सकती हैं। यदि लोग घरों से काम करेंगे, तो परिवहन में इस्तेमाल होने वाले ईंधन की भारी बचत होगी, जिससे देश का अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार बचेगा।इससे न केवल विदेशी मुद्रा बचेगी, बल्कि शहरों में प्रदूषण के स्तर में भी गिरावट आएगी।
एक साल तक सोना न खरीदने की अपील
भारत दुनिया में सोने के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक है। प्रधानमंत्री ने देशवासियों से एक साल तक सोने की खरीदारी टालने का आग्रह किया है। सोने का आयात सीधे तौर पर चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) को बढ़ाता है। डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर न हो, इसके लिए सोने के आयात पर लगाम लगाना जरूरी है। सरकार लोगों को भौतिक सोने (Physical Gold) के बजाय सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) जैसे डिजिटल विकल्पों की ओर प्रोत्साहित कर रही है।
खाद्य तेल और रासायनिक खाद में कटौती
पीएम ने खाने के तेल (Edible Oil) और फर्टिलाइजर के उपयोग को कम करने की बात कही है। भारत पाम ऑयल और अन्य खाद्य तेलों के लिए इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों पर निर्भर है। इसकी खपत कम करने से आयात बिल में कमी आएगी। रासायनिक खाद पर सरकार भारी सब्सिडी देती है और इसका कच्चा माल भी आयात किया जाता है। प्राकृतिक खेती (Natural Farming) को बढ़ावा देकर इस बोझ को कम करने का लक्ष्य है।
संकट से निपटने के लिए ‘कोरोना मॉडल’ का आह्वान
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में 2020 के कोरोना काल का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने याद दिलाया कि जिस तरह देश ने ‘जनता कर्फ्यू’ और ‘लॉकडाउन’ के दौरान कड़ा अनुशासन दिखाया था, वैसी ही एकजुटता की जरूरत इस ‘आर्थिक युद्ध’ में भी है। यह आह्वान किसी मजबूरी के कारण नहीं, बल्कि देश को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाए रखने के लिए एक ‘प्री-एम्पटिव स्ट्राइक’ (Pre-emptive Strike) है।


