विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 घंटे के भीतर दूसरी बार राष्ट्र के नाम संदेश जारी किया है। इस बार प्रधानमंत्री की अपील सीधे तौर पर देश की खपत की आदतों पर केंद्रित है। उन्होंने नागरिकों से ‘पेट्रोल-डीजल की बचत’ करने और ‘सोना (Gold) न खरीदने’ का कड़ा आह्वान किया है।
ईंधन की बचत: ‘देश के लिए एक लीटर तेल बचाएं’
प्रधानमंत्री ने बढ़ते वैश्विक तेल संकट और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल का हवाला देते हुए नागरिकों से ईंधन बचाने का आग्रह किया है।
- सार्वजनिक परिवहन का उपयोग: पीएम ने लोगों से अपील की है कि वे निजी वाहनों के बजाय सार्वजनिक परिवहन और मेट्रो का अधिकतम उपयोग करें।
- अनावश्यक यात्रा से बचें: उन्होंने कंपनियों से ‘वर्क फ्रॉम होम’ को बढ़ावा देने और नागरिकों से अनावश्यक निजी यात्राओं में कटौती करने को कहा है।
- आर्थिक कारण: भारत अपनी जरूरत का 80% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। ईंधन की कम खपत से देश का व्यापार घाटा (Trade Deficit) कम होगा।
‘सोना न खरीदें’: आर्थिक सुरक्षा की अपील
प्रधानमंत्री ने भारतीयों की सोने के प्रति पारंपरिक रुचि को संबोधित करते हुए कहा कि वर्तमान समय में भारी मात्रा में सोने का आयात देश की अर्थव्यवस्था के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। सोने का आयात करने के लिए भारत को बड़ी मात्रा में डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे रुपया कमजोर हो रहा है। पीएम ने सुझाव दिया कि यदि निवेश करना ही है, तो भौतिक सोने (Physical Gold) के बजाय सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) या डिजिटल निवेश को चुनें, ताकि पैसा देश के विकास कार्य में लगा रहे।
विदेशी मुद्रा भंडार की सुरक्षा
प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि वैश्विक स्तर पर जारी तनाव के कारण डॉलर की तुलना में रुपया दबाव में है। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserve) तेजी से घट रहा है। पीएम ने कहा, “हर वो ग्राम सोना जो हम खरीदते हैं और हर वो लीटर तेल जो हम व्यर्थ जलाते हैं, वो हमारी राष्ट्रीय संपत्ति को कम करता है।”
विपक्ष और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
पीएम की इस अपील के बाद राजनीतिक और आर्थिक गलियारों में बहस छिड़ गई है:
- विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री का 24 घंटे में दो बार अपील करना इस बात का संकेत है कि देश का भुगतान संतुलन (Balance of Payments) गंभीर स्थिति में पहुंच सकता है।
- विपक्षी दलों ने सरकार पर अर्थव्यवस्था को संभालने में विफल रहने का आरोप लगाया है और सवाल किया है कि क्या देश ‘आर्थिक आपातकाल’ की ओर बढ़ रहा है।
नागरिक जिम्मेदारी पर जोर
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन के अंत में इसे एक ‘देशभक्ति का कार्य’ बताया। उन्होंने कहा कि यह समय केवल सरकार के प्रयासों का नहीं, बल्कि 140 करोड़ देशवासियों की सामूहिक जिम्मेदारी का है। उन्होंने नागरिकों से आग्रह किया कि वे अपनी जीवनशैली में सादगी अपनाएं ताकि देश इस वैश्विक आर्थिक भंवर से सुरक्षित बाहर निकल सके।
पश्चिम एशिया संकट: दशक की सबसे बड़ी चुनौती
प्रधानमंत्री ने वर्तमान वैश्विक स्थिति की तुलना कोविड-19 महामारी से करते हुए कहा, यदि कोविड-19 इस शताब्दी का सबसे बड़ा संकट था, तो पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष इस दशक का सबसे भीषण संकट है। जिस तरह पूरे देश ने एकजुट होकर कोरोना महामारी पर विजय प्राप्त की थी, उसी तरह सामूहिक संकल्प और अनुशासन से हम इस वैश्विक संकट के आर्थिक प्रभावों से भी उबर जाएंगे। उन्होंने याद दिलाया कि पिछले दशकों में भी जब कभी देश पर युद्ध या बाहरी संकट आया, भारतीयों ने सरकार की अपील पर अपनी जिम्मेदारियां बखूबी निभाई हैं।


