भारत में चुनावी सरगर्मी और आगामी राज्य विधानसभा चुनावों के बीच, विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस (TMC), समाजवादी पार्टी (SP) और DMK सहित ‘INDIA’ गठबंधन के कई प्रमुख दलों ने उन्हें पद से हटाने के लिए एक नई योजना तैयार की है।
विपक्ष के आरोपों का आधार
विपक्षी दलों का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त का झुकाव सत्ता पक्ष की ओर है। उनके प्रमुख दावों में शामिल हैं:
- चुनावी निष्पक्षता पर सवाल: विपक्ष का तर्क है कि आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों में विपक्षी नेताओं पर त्वरित कार्रवाई की जा रही है, जबकि सत्ता पक्ष के बयानों को नजरअंदाज किया गया।
- EVMs और मतदाता सूची: हाल के उपचुनावों और आगामी चुनावों के लिए मतदाता सूची के पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर विपक्ष असंतुष्ट है।
हटाने की योजना और संवैधानिक प्रक्रिया
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना कोई आसान प्रक्रिया नहीं है। भारत के संविधान के अनुसार, CEC को केवल उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है जिससे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
- महाभियोग (Impeachment) जैसा प्रस्ताव: विपक्ष संसद में एक प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए लोकसभा के कम से कम 100 सदस्यों या राज्यसभा के 50 सदस्यों के हस्ताक्षर वाला नोटिस देना अनिवार्य है।
- जांच समिति: यदि संसद के पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष या सभापति) नोटिस स्वीकार कर लेते हैं, तो आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की जाती है।
- विशेष बहुमत: आरोप सिद्ध होने के बाद, संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत (उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई और सदन की कुल संख्या का बहुमत) से प्रस्ताव पारित होना जरूरी है।
राजनीतिक मायने
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि विपक्ष के पास वर्तमान संसद में इस प्रस्ताव को पारित कराने के लिए पर्याप्त संख्या बल नहीं है। हालांकि, इस कदम का मुख्य उद्देश्य जनता के बीच चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना और चुनावों से पहले “दबाव की राजनीति” बनाना है।
यदि विपक्ष यह नोटिस देता है, तो यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में किसी CEC के खिलाफ इस तरह की दूसरी बड़ी कोशिश होगी। फिलहाल, कांग्रेस और TMC इस मुद्दे पर अन्य क्षेत्रीय दलों को एकजुट करने में जुटी हैं।


