पश्चिम बंगाल की राजनीति और देश के संसदीय इतिहास में एक बेहद अनोखा उलटफेर देखने को मिला है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने एक बेहद गुमनाम और क्षेत्रीय राजनीतिक दल नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय (Merger) करने का फैसला किया है।
यह वही पार्टी है जिसका वजूद कल तक न के बराबर था, लेकिन आज रातों-रात इसके पास संसद के निचले सदन (Lok Sabha) में 20 सांसद हो गए हैं, जिससे यह एनडीए (NDA) गठबंधन में टीडीपी (16 सांसद) और जेडीयू (12 सांसद) को पीछे छोड़कर भाजपा के बाद दूसरा सबसे बड़ा घटक दल बन गया है। आइए समझते हैं इस पार्टी का दिलचस्प इतिहास और इसके पीछे का कानूनी गणित:
सिर्फ 822 वोट से 20 सांसदों तक का सफर
एनसीपीआई (NCPI) का इतिहास राजनीतिक पन्नों में लगभग अदृश्य रहा है:
- स्थापना और पंजीकरण: इस पार्टी का पंजीकरण (Registration) और गठन त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल के जुड़ाव के साथ हुआ था। हालांकि यह त्रिपुरा आधारित पार्टी मानी जाती है, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इसका रजिस्टर्ड हेडक्वार्टर पश्चिम बंगाल के हावड़ा (सांकराइल) में है। इसकी अध्यक्ष शिउली कुंडू हैं, जो कलकत्ता हाई कोर्ट में वकील हैं।
- 2023 का चुनावी प्रदर्शन: पार्टी ने साल 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाई थी। इसने कुल 4 उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 3 सीटों (चावमानू, अम्बासा और कैलाशहर) पर इसके प्रत्याशी चुनाव लड़ सके।
- NOTA से भी कम वोट: चुनाव में पार्टी को पूरी तरह से नकार दिया गया था। इसके उम्मीदवारों को कुल मिलाकर सिर्फ 822 वोट मिले थे (कुछ सीटों पर तो इन्हें नोटा से भी कम वोट मिले)। इसके बाद से यह पार्टी पूरी तरह से राजनीतिक परिदृश्य से गायब थी।
- पार्टी का चुनाव चिन्ह: निर्वाचन आयोग द्वारा इस गैर-मान्यता प्राप्त पंजीकृत दल को ‘पेन की निब और सात किरणें’ (Pen nib with seven rays) चुनाव चिन्ह आवंटित किया गया था।
एक दिलचस्प विरोधाभास: अपने ही नारे के खिलाफ विलय
इस पूरे घटनाक्रम में एक बड़ा विरोधाभास (Irony) भी सामने आया है। साल 2023 के चुनाव में जब एनसीपीआई (NCPI) प्रचार कर रही थी, तो उसके पोस्टरों और कैंपेन का मुख्य नारा था:
“अपने अधिकारों को बचाने के लिए, दलबदलू राजनेताओं को नकारें। राजनीतिक हस्तियों को नहीं, बल्कि समाजसेवियों को समर्थन दें।”
आज वही पार्टी अपनी ही घोषित नीति के विपरीत, टीएमसी से बगावत करके आए 20 सांसदों का स्वागत कर अपनी ताकत बढ़ा रही है।
बागियों ने इस छोटी पार्टी को ही क्यों चुना?
टीएमसी के वरिष्ठ सांसद सुदीप बंदोपाध्याय और काकोली घोष दस्तिदार के नेतृत्व वाले इस बागी गुट ने भाजपा में सीधे शामिल होने के बजाय एनसीपीआई को इसलिए चुना ताकि वे दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) की कड़े कानूनी शिकंजे से बच सकें:
- कानूनी ढाल: दलबदल विरोधी कानून के तहत किसी पार्टी के सांसदों की सदस्यता तब बच सकती है, जब कम से कम दो-तिहाई (2/3) सांसद अलग होकर किसी दूसरी पंजीकृत राजनीतिक पार्टी में अपना विलय (Merger) करें।
- सटीक संख्या बल: लोकसभा में टीएमसी के कुल 28 सांसद हैं। दलबदल से बचने के लिए दो-तिहाई के आंकड़े के हिसाब से कम से कम 19 सांसदों की जरूरत थी। इस बागी गुट के पास 20 सांसद हैं, यानी कानूनी रूप से यह विलय पूरी तरह सुरक्षित है।
- ‘असली TMC’ पर दावा: बागी नेताओं का कहना है कि यह विलय एक तात्कालिक व्यवस्था (Stopgap arrangement) है। जब जुलाई में संसद सत्र शुरू होगा, तो वे चुनाव आयोग और कोर्ट के सामने खुद को ही ‘असली तृणमूल कांग्रेस’ घोषित करने की कानूनी लड़ाई लड़ेंगे।
ममता बनर्जी के खेमे (सागरिका घोष और कीर्ति आजाद) ने तुरंत लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मिलकर इस गुट को मान्यता न देने की अपील की है और इसे बंगाल की जनता के जनादेश के साथ ‘घोर विश्वासघात’ करार दिया है।


