पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) का आंतरिक संकट अब एक बड़े राजनीतिक तूफान (सुनामी) में तब्दील हो चुका है। पार्टी के भीतर असंतोष और बगावत इस कदर बढ़ गई है कि अब टीएमसी के संसदीय दल (Parliamentary Wing) में औपचारिक रूप से बड़ी टूट तय मानी जा रही है।
पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी द्वारा बुलाई गई समीक्षा बैठक से सांसदों और विधायकों की भारी दूरी ने तृणमूल के भविष्य और एकता पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बैठक से दूरी और बगावत के संकेत
चुनावी नतीजों के बाद संगठन को फिर से एकजुट करने और हार के कारणों पर मंथन करने के लिए ममता बनर्जी ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं, सांसदों और विधायकों की एक आपात बैठक बुलाई थी। हालांकि, इस महत्वपूर्ण बैठक का नतीजा पार्टी के पक्ष में जाने के बजाय उसके बिखरने का सबूत बन गया।
- नेताओं की अनुपस्थिति: बैठक में पार्टी के कई दिग्गज सांसदों और विधायकों ने हिस्सा नहीं लिया। इतनी बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों का दूरी बनाना यह साफ संकेत देता है कि उनका अब शीर्ष नेतृत्व पर भरोसा नहीं रहा।
- संसदीय दल में फूट: अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, असंतुष्ट सांसदों का एक बड़ा गुट अलग होकर नया धड़ा बनाने या पाला बदलने की तैयारी में है, जिससे संसद और विधानसभा दोनों जगह टीएमसी को भारी नुकसान होना तय है।
संकट के बीच हुमायूं कबीर का चौंकाने वाला बयान
TMC में मची इस ऐतिहासिक उथल-पुथल और बगावत के बीच, मुर्शिदाबाद के प्रभावशाली मुस्लिम नेता और आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के फाउंडर हुमायूं कबीर का एक बड़ा बयान सामने आया है। 2026 के चुनावों में दो सीटों (नौदा और रेजीनगर) से जीत दर्ज करने वाले कबीर ने ममता बनर्जी को एक चौंकाने वाला ऑफर दिया है। कबीर का यह बयान ऐसे समय में आया है जब शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम सीट खाली कर भवानीपुर अपने पास रखी है, जहां उन्होंने ममता बनर्जी को मात दी थी।
41 सांसदों में से महज 6 सांसद ही पहुंचे
पार्टी के 41 सांसदों में से महज 6 सांसद ही ममता बनर्जी की बैठक में पहुंचे। यानी करीब 85% सांसदों ने इस महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक से दूरी बना ली, जो कि संसदीय दल में एक बहुत बड़ी और औपचारिक टूट का स्पष्ट संकेत है।विधायकों के विरोधी गुट से दूरी बनाए रखने वाले बचे-कुचे 21 विधायकों में से भी महज 8 विधायकों ने हाजिरी लगाई।
पार्टी की बेहद मुखर और सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वालीं महुआ मोइत्रा और सायनी घोष जैसी बड़ी महिला नेताओं का बैठक में न आना यह दिखाता है कि असंतोष सिर्फ पुराने नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि नए और युवा चेहरे भी नेतृत्व से किनारा कर रहे हैं। इस ऐतिहासिक संकट के बीच जो महज 6 सांसद ममता बनर्जी के साथ खड़े नजर आए, उनमें पार्टी के सबसे भरोसेमंद और कोर कमेटी के चेहरे शामिल हैं:
उठ रहे हैं कई गंभीर सवाल
इस चुनावी पराजय और संगठन में मची भगदड़ ने 28 साल पुरानी उस पार्टी के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान लगा दिया है जिसकी स्थापना खुद ममता बनर्जी ने की थी:
- नेतृत्व क्षमता पर सवाल: क्या ममता बनर्जी अब अपनी पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष और बगावत को थामने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही हैं?
- अभिषेक बनर्जी की रणनीति: पार्टी में ‘नंबर दो’ और युवाओं के चेहरे माने जाने वाले अभिषेक बनर्जी की चुनावी रणनीति और सांगठनिक फैसलों पर भी अब उंगलियां उठने लगी हैं।
- भविष्य की राह: संसदीय दल टूटने के बाद क्या टीएमसी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बचा पाएगी या यह संकट पार्टी को पूरी तरह बिखेर देगा?


