तापसी पन्नू की फिल्म ‘गांधारी’ एक ऐसी मां की कहानी है, जो अपनी लापता बेटी को खोजने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। फिल्म का आधार दिलचस्प है—एक मां, उसकी बेटी का अपहरण और फिर उस बच्ची को वापस पाने के लिए शुरू होती खतरनाक तलाश। निर्देशक देवाशीष मखीजा और लेखिका कनिका ढिल्लों ने इस कहानी में चाइल्ड ट्रैफिकिंग, बदले और एक्शन का तड़का लगाया है। फिल्म 3 सितंबर को नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई है।
महाभारत की गांधारी से कनेक्शन
फिल्म का शीर्षक ‘गांधारी’ अपने आप में कहानी की ओर इशारा करता है। महाभारत में गांधारी ने अपने पति धृतराष्ट्र के कारण आंखों पर पट्टी बांधी थी, जबकि यहां बानी अपनी बेटी तक पहुंचने के लिए अंधेरे को ही अपना हथियार बनाती है। फिल्म इस समानता को स्थापित करने की कोशिश करती है, लेकिन इसे बहुत गहराई तक नहीं ले जा पाती। विचार मजबूत है, मगर उसका इस्तेमाल कहानी में और प्रभावशाली ढंग से किया जा सकता था।
तापसी का एक्शन दमदार
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत तापसी पन्नू हैं। बानी के किरदार में वह गुस्से, दर्द और जिद को पर्दे पर मजबूती से पेश करती हैं। खासकर एक्शन दृश्यों में तापसी का अंदाज प्रभावित करता है। फिल्म का एक्शन उन्हें एक मजबूत महिला किरदार के रूप में स्थापित करता है और यह हिस्सा दर्शकों को बांधे रखने में कामयाब रहता है।
ट्रेलर से ही साफ था कि बानी को अपनी बेटी की तलाश में असामान्य परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा। आंखों की रोशनी जाने के बाद भी उसका पीछे न हटना कहानी को अलग पहचान देता है। छाया कदम का किरदार भी बानी की इस यात्रा में अहम भूमिका निभाता है और उन्हें प्रशिक्षण देता है।
मां-बेटी वाला इमोशन कमजोर
जहां फिल्म एक्शन के स्तर पर असर छोड़ती है, वहीं इसकी सबसे बड़ी कमजोरी वही रिश्ता बन जाता है, जिसके इर्द-गिर्द पूरी कहानी बुनी गई है। मां और बेटी के बीच भावनात्मक जुड़ाव को उतनी गहराई नहीं मिल पाती, जितनी इस कहानी को चाहिए थी।
दर्शक को यह समझ तो आता है कि बानी अपनी बेटी के लिए जान की बाजी लगा रही है, लेकिन कई जगह उसके दर्द को महसूस करने के बजाय सिर्फ घटनाओं को देखते रहने का एहसास होता है। यानी कहानी भावनात्मक होने की कोशिश करती है, मगर वह असर लगातार कायम नहीं रख पाती।
कई विषयों का बोझ
‘गांधारी’ सिर्फ मां-बेटी की कहानी नहीं रहती। इसमें चाइल्ड ट्रैफिकिंग, रहस्यमयी दुनिया, बहुरुपियों का इलाका, सुरंगें और बदले की कहानी जैसे कई तत्व शामिल कर दिए गए हैं। यही विस्तार कुछ जगह फिल्म को रोमांचक बनाता है, लेकिन दूसरी ओर मूल भावनात्मक कहानी से ध्यान भी भटकाता है। चाइल्ड ट्रैफिकिंग पर हिंदी सिनेमा में पहले भी ‘मर्दानी’, ‘लव सोनिया’ और ‘सेक्टर 36’ जैसी फिल्में बन चुकी हैं, इसलिए ‘गांधारी’ के सामने इस विषय को नए अंदाज में पेश करने की चुनौती भी थी।
कुल मिलाकर ‘गांधारी’ तापसी पन्नू के दमदार एक्शन और मजबूत स्क्रीन प्रेजेंस के कारण देखने लायक बनती है, लेकिन मां-बेटी के रिश्ते को पर्याप्त भावनात्मक गहराई न मिल पाने के कारण फिल्म वह असर नहीं छोड़ पाती, जिसकी उम्मीद कहानी से होती है। अगर आपको महिला-केंद्रित एक्शन थ्रिलर पसंद हैं, तो फिल्म आपको आकर्षित कर सकती है; लेकिन अगर आप एक गहरी और दिल छू लेने वाली मां-बेटी की कहानी की उम्मीद कर रहे हैं, तो कुछ निराशा हो सकती है।


