हिंदू धर्म में रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम, स्नेह और सुरक्षा के संकल्प का प्रतीक है। श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाने वाला यह त्योहार केवल धागा बांधने की रस्म नहीं, बल्कि सुरक्षा का वचन है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा केवल भाई-बहन तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि यह रक्षा, सम्मान और विजय की कामना के लिए भी बांधी जाती थी।
आइए जानते हैं कि सबसे पहला रक्षा सूत्र किसने बांधा था और इससे जुड़ी चार मुख्य पौराणिक कथाएं कौन-कौन सी हैं।
रक्षाबंधन की 4 मुख्य पौराणिक कथाएं
1. इंद्रदेव और माता शची की कथा (विजय का रक्षा सूत्र)
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में देवताओं और असुरों के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया था। असुरों का पलड़ा भारी देखकर देवताओं के राजा इंद्रदेव चिंतित हो गए। तब इंद्रदेव की पत्नी माता शची (इंद्राणी) ने भगवान विष्णु की प्रेरणा से एक पवित्र रेशमी धागे में मंत्रों की शक्ति समाहित की और उसे देवराज इंद्र की कलाई पर बांध दिया।
- परिणाम: इस रक्षा सूत्र के प्रभाव से इंद्रदेव ने युद्ध में असुरों को पराजित कर स्वर्ग पर पुनः अपना अधिकार स्थापित किया। इस कथा से सिद्ध होता है कि प्राचीन काल में रक्षा सूत्र केवल बहन ही नहीं, बल्कि पत्नी भी पति की रक्षा और विजय के लिए बांधती थी।
2. माता लक्ष्मी और राजा बलि की कथा (वचन की राखी)
जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगकर उनका सब कुछ दान में ले लिया, तो बलि की दानवीरता से प्रसन्न होकर विष्णु जी ने उनसे वरदान मांगने को कहा। राजा बलि ने भगवान से पाताल लोक में उनके साथ रहने का वरदान मांग लिया।
भगवान विष्णु के पाताल लोक चले जाने से माता लक्ष्मी चिंतित हो गईं। तब माता लक्ष्मी ने एक निर्धन स्त्री का रूप धारण किया और राजा बलि के पास जाकर उन्हें रक्षा सूत्र बांधा और अपना भाई बना लिया। जब बलि ने उनसे उपहार मांगने को कहा, तो माता लक्ष्मी ने अपने वास्तविक रूप में आकर भगवान विष्णु को पाताल लोक से मुक्त कराने का वचन मांग लिया। राजा बलि ने अपनी बहन का सम्मान करते हुए श्री हरि को सहर्ष विदा किया।
3. द्रौपदी और श्री कृष्ण की कथा (अटूट विश्वास का धागा)
महाभारत काल की यह कथा अत्यधिक प्रसिद्ध है। जब भगवान श्री कृष्ण ने शिशुपाल का वध करने के लिए अपना सुदर्शन चक्र चलाया, तो लौटते समय उनकी अंगुली कट गई और रक्त बहने लगा। यह देखकर पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने बिना क्षण गंवाए अपनी साड़ी का आंचल फाड़कर श्री कृष्ण की अंगुली पर बांध दिया।
- रक्षा का वचन: श्री कृष्ण ने द्रौपदी के इस भाव से अभिभूत होकर उन्हें हर संकट में रक्षा करने का वचन दिया। आगे चलकर जब कौरवों की सभा में द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था, तब श्री कृष्ण ने चीर बढ़ाकर द्रौपदी की लाज बचाई और अपना वचन निभाया।
4. देवी संतोषी और शुभ-लाभ की कथा (बहन का स्नेह)
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान गणेश के दो पुत्र थे – शुभ और लाभ। रक्षाबंधन के दिन जब गणेश जी की बहन मानसा उन्हें राखी बांध रही थीं, तब शुभ और लाभ ने भी अपने पिता से एक बहन की इच्छा व्यक्त की, ताकि वे भी रक्षाबंधन का पर्व मना सकें।
पुत्रों के हठ और महर्षि नारद के परामर्श पर भगवान गणेश ने अपनी रिद्धि-सिद्धि की शक्तियों से एक दिव्य पुत्री को प्रकट किया, जिन्हें माता संतोषी के नाम से जाना गया। इसके बाद शुभ और लाभ ने अपनी बहन संतोषी से रक्षा सूत्र बंधवाया और यह पर्व हर्षोल्लास से मनाया।
इन चारों कथाओं से यह स्पष्ट होता है कि रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा केवल एक रिश्ते तक सीमित नहीं है। यह संकल्प, रक्षा, विश्वास और कर्तव्य का सूचक है। चाहे वह पत्नी द्वारा पति की विजय के लिए बांधा गया धागा हो या बहन द्वारा भाई से मांगी गई सुरक्षा – रक्षाबंधन का मूल आधार एक-दूसरे के प्रति समर्पण और निष्ठा ही है।


