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    ‘डिजिटल अरेस्ट’ को लेकर सुप्रीम कोर्ट की चिंता, CJI ने कहा-शिक्षित वर्ग भी शिकार

    नई दिल्ली (20 अप्रैल 2026): देश में बढ़ते साइबर अपराध के नए रूप ‘डिजिटल अरेस्ट’ (Digital Arrest) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता व्यक्त की है। सोमवार को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यह बेहद चौंकाने वाला है कि समाज के पढ़े-लिखे और जागरूक लोग भी इस धोखाधड़ी के जाल में फंस रहे हैं।


    सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: “शिक्षित वर्ग भी शिकार”

    सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने डिजिटल अरेस्ट के बढ़ते मामलों पर हैरानी जताई। सीजेआई ने कहा कि अपराधी पुलिस, सीबीआई या ईडी का अधिकारी बनकर लोगों को फोन करते हैं और उन्हें घंटों तक वीडियो कॉल पर बंधक बनाकर रखते हैं। यह केवल वित्तीय धोखाधड़ी नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक हमला है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि डॉक्टर, इंजीनियर और सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी भी इस तरह के झांसे में आकर अपनी जीवन भर की कमाई लुटा रहे हैं, तो यह व्यवस्था की विफलता और जागरूकता की कमी को दर्शाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय से पूछा है कि इस तरह के ‘वर्चुअल फ्रॉड’ को रोकने के लिए अब तक क्या तकनीकी कदम उठाए गए हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय इन गैंग्स पर नकेल कसने की क्या योजना है।


    क्या है ‘डिजिटल अरेस्ट’ का मायाजाल?

    डिजिटल अरेस्ट कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि ठगी का एक तरीका है। ठग पीड़ित को कॉल करके बताते हैं कि उनके नाम से कोई अवैध पार्सल (ड्रग्स या जाली पासपोर्ट) पकड़ा गया है। अपराधी पुलिस की वर्दी पहनकर स्काइप या व्हाट्सएप वीडियो कॉल करते हैं, जिसके पीछे का बैकग्राउंड बिल्कुल असली थाने जैसा दिखता है। पीड़ित को डराकर कहा जाता है कि जब तक जांच पूरी नहीं होती, वे कैमरा बंद नहीं कर सकते। इसे ही वे ‘डिजिटल अरेस्ट’ का नाम देते हैं। अंत में केस रफा-दफा करने के नाम पर पीड़ित से लाखों रुपये ट्रांसफर करवा लिए जाते हैं।


      सरकार और पुलिस की तैयारी

      सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। हाल ही में प्रधानमंत्री ने भी ‘मन की बात’ कार्यक्रम में इस खतरे से आगाह करते हुए कहा था कि “रुको, सोचो और एक्शन लो”।

      अदालत ने सुझाव दिया है कि बैंकों और दूरसंचार कंपनियों को संदिग्ध कॉल और असामान्य ट्रांजेक्शन पर रियल-टाइम अलर्ट सिस्टम और मजबूत करना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी सरकारी एजेंसी के पास वीडियो कॉल के जरिए किसी को ‘अरेस्ट’ करने का अधिकार नहीं है, और ऐसी किसी भी कॉल आने पर तुरंत 1930 (साइबर हेल्पलाइन) पर शिकायत दर्ज करनी चाहिए।

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