More
    HomeHindi NewsBusinessसऊदी अरब का क्रूड प्रोडक्शन 36 साल में सबसे कम, तेल की...

    सऊदी अरब का क्रूड प्रोडक्शन 36 साल में सबसे कम, तेल की कीमतों पर पड़ेगा असर, भारत के लिए बढ़ी चिंता

    वैश्विक कच्चे तेल बाजार में भारत की चिंता बढ़ गई है। दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातकों में शामिल सऊदी अरब का क्रूड ऑयल उत्पादन अगस्त 2026 में गिरकर करीब 62.38 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। यह 1990 के बाद यानी करीब 36 वर्षों में सबसे निचला स्तर है। जुलाई की तुलना में सऊदी उत्पादन में लगभग 19 लाख बैरल प्रतिदिन की बड़ी गिरावट दर्ज की गई।

    क्यों घटा सऊदी अरब का तेल उत्पादन?

    उत्पादन में इस भारी गिरावट के पीछे मुख्य वजह मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष और तेल की सप्लाई से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियां हैं। ईरान युद्ध के बीच सऊदी अरब के पश्चिमी तट के बंदरगाहों और समुद्री मार्गों पर खतरा बढ़ा है। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों की गतिविधियों ने लाल सागर और बाब-अल-मंदेब क्षेत्र में तेल परिवहन को प्रभावित किया है।

    सऊदी अरब ने अपनी सप्लाई को वैकल्पिक मार्गों से निकालने की कोशिश की है। लाल सागर स्थित यानबू बंदरगाह इसके लिए अहम विकल्प बनकर उभरा है। हालांकि, इस रास्ते पर भी सुरक्षा जोखिम बने हुए हैं। हाल के दिनों में यानबू से क्रूड और कंडेनसेट की लोडिंग में सुधार जरूर हुआ है, लेकिन अगस्त में यहां भी गतिविधियां प्रभावित हुई थीं।

    तेल की कीमतों पर सीधा असर

    सऊदी अरब की उत्पादन क्षमता में इतनी बड़ी कमी ऐसे समय आई है, जब वैश्विक तेल बाजार पहले से ही सप्लाई संकट से जूझ रहा है। अगस्त में ओपेक के 11 सदस्यों का कुल उत्पादन भी करीब 6.4 लाख बैरल प्रतिदिन घटकर 1.971 करोड़ बैरल प्रतिदिन रह गया। सऊदी अरब और ईरान से जुड़ी सप्लाई बाधाएं इसकी बड़ी वजह रही हैं।

    इसका असर कच्चे तेल की कीमतों पर साफ दिखाई दे रहा है। ब्रेंट क्रूड की कीमत हाल में 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई है, जबकि डब्ल्यूटीआई भी 100 डॉलर के आसपास कारोबार कर रहा है।

    भारत के लिए क्यों है खतरे की घंटी?

    भारत अपनी जरूरत के 80 प्रतिशत से अधिक कच्चे तेल का आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

    महंगा क्रूड भारत के लिए आयात बिल बढ़ा सकता है। इससे पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव, परिवहन लागत में बढ़ोतरी और महंगाई बढ़ने का जोखिम रहता है। तेल महंगा होने से चालू खाते के घाटे और रुपये पर भी दबाव बढ़ सकता है।

    आगे क्या होगा?

    ओपेक+ ने अक्टूबर के लिए उत्पादन नीति में बदलाव नहीं करने का फैसला किया है। ऐसे में अगर सऊदी अरब की सप्लाई जल्दी सामान्य नहीं होती और मध्य-पूर्व के समुद्री रास्तों पर संकट जारी रहता है, तो तेल बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है।

    अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के मुताबिक भी 2026 में वैश्विक तेल भंडार तेजी से घटे हैं और मध्य-पूर्व में उत्पादन बंद होने की स्थिति ने बाजार पर दबाव बढ़ाया है।

    भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर रहने वाला क्रूड महंगाई और आयात खर्च दोनों को कितना प्रभावित करता है। ऐसे में सऊदी उत्पादन में आई 36 साल की यह गिरावट सिर्फ तेल बाजार की खबर नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण चेतावनी है।

    RELATED ARTICLES

    Most Popular

    Recent Comments