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    ‘पूजा मेरी जान’ रिव्यू: फिल्म में हैं मृणाल ठाकुर और हुमा कुरैशी, जानें क्या है कहानी?

    मृणाल ठाकुर और हुमा कुरैशी की फिल्म ‘पूजा मेरी जान’ एक ऐसे सवाल को सामने रखती है, जो रिश्तों से आगे बढ़कर समाज की सोच पर चोट करता है—अगर कोई लड़की किसी लड़के के प्यार को ठुकरा दे, तो क्या उसके लिए उस फैसले की कीमत चुकाना जरूरी है? नवजोत गुलाटी के निर्देशन में बनी यह फिल्म एकतरफा प्यार, रिजेक्शन, सोशल मीडिया ट्रायल और जेंडर बायस को कोर्टरूम ड्रामा के जरिए सामने लाती है। फिल्म 2 अक्टूबर को ZEE5 पर रिलीज हुई और इसकी अवधि करीब 1 घंटा 57 मिनट है।

    कहानी पूजा (मृणाल ठाकुर) और अनिकेत (विक्रम सिंह चौहान) से शुरू होती है। दोनों थिएटर ग्रुप का हिस्सा हैं। अनिकेत पूजा को पसंद करता है और अपने प्यार का इजहार करता है, लेकिन पूजा साफ तौर पर उसे मना कर देती है। वह अपनी जिंदगी और रिश्तों को लेकर स्पष्ट है। अनिकेत इस रिजेक्शन को स्वीकार नहीं कर पाता और बाद में उसकी मौत हो जाती है।

    इसके बाद कहानी पूरी तरह बदल जाती है। अनिकेत की मौत का जिम्मेदार पूजा को ठहराया जाने लगता है। सोशल मीडिया पर भी उसके खिलाफ माहौल बनता है और मामला अदालत तक पहुंच जाता है। पूजा की दोस्त सना (हुमा कुरैशी), जो पेशे से वकील है, उसका केस लड़ती है। सामने सरकारी वकील जतिन त्रिवेदी (विजय राज) हैं। कोर्टरूम के जरिए फिल्म यह सवाल उठाती है कि किसी महिला का किसी पुरुष को ‘ना’ कहना आखिर कब से अपराध जैसा माना जाने लगा?

    मृणाल और हुमा का अभिनय

    मृणाल ठाकुर ने पूजा के किरदार को जरूरत से ज्यादा नाटकीय बनाने की कोशिश नहीं की है। डर, दबाव और अकेलेपन वाले दृश्यों में उनका अभिनय सहज नजर आता है। पूजा एक ऐसी महिला है जो अपने फैसले खुद लेना चाहती है और मृणाल इस पक्ष को प्रभावी ढंग से निभाती हैं। हालांकि कुछ जगह किरदार की कमजोर लिखावट उनके अभिनय की संभावनाओं को सीमित करती है।

    हुमा कुरैशी के लिए सना का किरदार दिलचस्प है। शुरुआत में वह पूजा के नजरिए को पूरी तरह नहीं समझती, लेकिन धीरे-धीरे उसका पक्ष लेने लगती है। हुमा ने इस बदलाव को सहज रखा है और कोर्ट के दृश्यों में उनकी मौजूदगी कहानी को मजबूती देती है। विजय राज भी अपने हिस्से की भूमिका में प्रभाव छोड़ते हैं।

    फिल्म की सबसे बड़ी ताकत और कमजोरी

    फिल्म की सबसे बड़ी ताकत उसका विषय है। ‘ना’ को स्वीकार करना, रिजेक्शन के बाद किसी महिला के चरित्र पर सवाल उठाना और सोशल मीडिया की भीड़ का फैसला सुनाना—इन मुद्दों को फिल्म सीधे छूती है। दूसरी ओर, इसकी पटकथा उतनी धारदार नहीं बन पाती। कई हिस्सों में कहानी दोहराव का शिकार होती है और कोर्टरूम ड्रामा को और मजबूत बनाया जा सकता था। कुछ समीक्षकों ने भी फिल्म के विचार को प्रभावी लेकिन लेखन को असमान बताया है।

    देखें या नहीं?

    ‘पूजा मेरी जान’ कोई पूरी तरह परफेक्ट कोर्टरूम थ्रिलर नहीं है, लेकिन इसका मुद्दा प्रासंगिक है। फिल्म यह सोचने पर मजबूर करती है कि प्यार में ‘ना’ सुनने के बाद समाज किसे दोषी मानता है। मृणाल ठाकुर और हुमा कुरैशी का अभिनय फिल्म को संभालता है, जबकि कमजोर स्क्रीनप्ले इसका असर कुछ कम कर देता है। अगर आप रिश्तों, सहमति और जेंडर से जुड़े सामाजिक सवालों पर बनी फिल्में पसंद करते हैं, तो इसे एक बार देखा जा सकता है।

    रेटिंग: 3/5

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