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    लोकसभा चुनाव में भी ऐसा ही होगा, ममता के ही सांसद की भविष्यवाणी

    पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की करारी शिकस्त के बाद पार्टी के भीतर चल रहा अंदरूनी संकट अब पूरी तरह खुलकर सामने आ गया है। ममता बनर्जी द्वारा कोलकाता में बुलाई गई आपातकालीन समीक्षा बैठक में पार्टी के 41 सांसदों में से केवल छह ही पहुंचे। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम के बाद अब तृणमूल के ही एक वरिष्ठ सांसद ने बड़ा बयान देकर सनसनी फैला दी है।

    सांसद के इस बयान से साफ संकेत मिल रहे हैं कि जो टूट कोलकाता के विधानसभा (विधायक दल) में देखी जा रही है, उसकी गूंज अब दिल्ली के लोकसभा (संसदीय दल) में भी सुनाई देगी और ममता बनर्जी को दिल्ली में एक और ऐतिहासिक झटका लगने जा रहा है।

    ‘मैंने अपने राजनीतिक जीवन में ऐसा कभी नहीं देखा’ — TMC सांसद

    ममता बनर्जी की बैठक से दूरी बनाने वाले सांसदों में से एक वरिष्ठ राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी के मौजूदा हालात और बिखरते वजूद पर बेहद हैरान करने वाला दावा किया है:

    • ऐतिहासिक बगावत: सांसद ने कहा, “मैंने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में तृणमूल कांग्रेस के भीतर ऐसा नजारा कभी नहीं देखा। पार्टी के भीतर असंतोष इस स्तर पर पहुंच चुका है कि शीर्ष नेतृत्व के प्रति अब कोई डर या वफादारी नहीं बची है।”
    • लोकसभा में भी होगी टूट: उन्होंने आगे संकेत देते हुए कहा कि जो बगावत और बिखराव बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद विधायक दल में दिखाई दे रहा है, ठीक वैसा ही आगामी दिनों में दिल्ली की लोकसभा और संसदीय दल में भी देखने को मिलेगा।

    दिल्ली में भी ममता बनर्जी को लगेगा बड़ा झटका!

    समीक्षा बैठक के आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि सांसदों का एक बहुत बड़ा बहुमत ममता बनर्जी के नेतृत्व से किनारा कर चुका है। 41 सांसदों में से 35 सांसदों का बैठक से नदारद रहना यह साफ इशारा है कि दिल्ली में तृणमूल का संसदीय दल अब दोफाड़ होने की कगार पर है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि महुआ मोइत्रा और सायनी घोष जैसे मुखर और बड़े चेहरों का इस बैठक से दूरी बनाना यह संकेत देता है कि बागी सांसदों का यह गुट दिल्ली में अपनी एक अलग रणनीति बना रहा है। यदि संसद के भीतर यह बागी धड़ा खुद को एक अलग गुट के रूप में मान्यता दिलाने की मांग करता है, तो राष्ट्रीय राजनीति और संसद में टीएमसी की ताकत और रसूख पूरी तरह जमींदोज हो जाएगा।

    पराजय के बाद नेतृत्व पर उठते गंभीर सवाल

    यह आंतरिक सुनामी केवल चुनाव हारने का नतीजा नहीं है, बल्कि पार्टी के भीतर लंबे समय से सुलग रहे असंतोष का विस्फोट है:

    1. अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली: पार्टी के भीतर कई वरिष्ठ नेता काफी समय से ‘नंबर दो’ अभिषेक बनर्जी की सांगठनिक रणनीतियों और टिकट बंटवारे के फैसलों से नाराज चल रहे थे।
    2. वफादारों की घटती संख्या: ममता की बैठक में केवल अभिषेक बनर्जी, सुदीप बंदोपाध्याय, कल्याण बनर्जी, माला रॉय, डेरेक ओ ब्रायन और डोला सेन जैसे मुट्ठी भर भरोसेमंद ही शामिल हुए,जिससे साफ है कि अब ममता बनर्जी का संकट मोचन करने वाले सिपहसालार बेहद कम बचे हैं।

    28 साल पहले ममता बनर्जी द्वारा खड़ी की गई तृणमूल कांग्रेस आज अपने इतिहास के सबसे बड़े वजूद की लड़ाई लड़ रही है, जहां कोलकाता से लेकर दिल्ली तक उनकी राजनीतिक जमीन खिसकती नजर आ रही है।

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