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    रिव्यू: ‘द इंडिया स्टोरी’ गंभीर और प्रासंगिक विषय, पंजाब की ‘कैंसर ट्रेन’ और जवान की है कहानी

    • फिल्म: द इंडिया स्टोरी (The India Story – Slow Poison in Progress)
    • कलाकार: श्रेयस तलपड़े, काजल अग्रवाल, तृषा शारदा, मुरली शर्मा, मनीष वाधवा
    • निर्देशक: चेतन डीके (Chettan DK)
    • रेटिंग: 2 / 5 स्टार

    ​कहानी का सार

    ​’द इंडिया स्टोरी’ देश के एक बेहद गंभीर और अनदेखे मुद्दे — खेती में कीटनाशकों (Pesticides) के अनियंत्रित इस्तेमाल और उससे फैलते कैंसर पर आधारित है। फिल्म की कहानी पंजाब की प्रसिद्ध ‘कैंसर ट्रेन’ और जहरीले रसायनों के कारण आम लोगों की जिंदगी पर पड़ रहे बुरे असर से प्रेरित है।

    ​कहानी पूर्व आर्मी अफसर मेजर योगेश पाटिल (श्रेयस तलपड़े) के इर्द-गिर्द घूमती है। उनकी 7 साल की मासूम बेटी परी (तृषा शारदा) को ब्लड कैंसर हो जाता है। जब योगेश इसकी गहराई में जाते हैं, तो उन्हें पता चलता है कि हमारी थाली तक पहुंचने वाले अनाज और सब्जियों में मिला खतरनाक पेस्टिसाइड ही इस बीमारी की मूल वजह है।

    ​अपनी बेटी को इंसाफ दिलाने और देश को इस ‘धीमे जहर’ से बचाने के लिए योगेश और उनकी वकील पत्नी अर्चना पाटिल (काजल अग्रवाल) बड़ी-बड़ी कंपनियों व व्यवस्था के खिलाफ कानूनी लड़ाई छेड़ते हैं।

    ​क्या खास है? (सकारात्मक पहलू)

    • प्रासंगिक विषय: फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका विषय है। आज के दौर में जब हर घर मिलावटी खाने और जहरीले केमिकल्स से प्रभावित हो रहा है, यह मुद्दा हर दर्शक से सीधे जुड़ता है।
    • कलाकारों का प्रदर्शन: श्रेयस तलपड़े ने एक बेबस और लाचार पिता के दर्द व गुस्से को बहुत ही संजीदगी से पर्दे पर उतारा है। काजल अग्रवाल एक इरादे की पक्की वकील के रूप में प्रभावशाली लगी हैं। वहीं, बाल कलाकार तृषा शारदा ने अपने छोटे लेकिन भावुक रोल से दिल जीता है। मुरली शर्मा और मनीष वाधवा जैसे अनुभवी कलाकारों ने अपने किरदारों के साथ न्याय किया है।

    ​कहां चूक गई फिल्म? (कमजोरियां)

    • कमजोर स्क्रीनप्ले: एक सामाजिक व संवेदनशील मुद्दे को उठाने के बावजूद फिल्म की पटकथा (Screenplay) बहुत ढीली है। फिल्म में वह कसावट और धार नहीं दिखती जो दर्शक को बांधकर रखे।
    • सतही कोर्टरूम ड्रामा: एक लीगल ड्रामा होने के नाते कोर्टरूम के दृश्यों में जोरदार बहस और ठोस तर्कों की उम्मीद थी, लेकिन यहां बहस सतही और दोहराव भरी लगती है।
    • ज़रूरत से ज़्यादा मेलोड्रामा: फिल्म कई जगहों पर टीवी धारावाहिकों जैसा मेलोड्रामा पेश करती है, जिससे मुद्दे की गंभीरता और असर कम हो जाता है। इसके अलावा, ठोस समाधान देने के बजाय कहानी आधी-अधूरी तसल्ली देकर खत्म हो जाती है।

    ​’द इंडिया स्टोरी’ की नीयत और विचार निसंदेह सराहनीय हैं। यह हर भारतीय नागरिक की सेहत से जुड़े एक ज्वलंत सवाल को सामने लाती है। हालांकि, कमजोर निर्देशन और ढीले लेखन की वजह से यह एक असरदार सोशल थ्रिलर बनने से रह जाती है। यदि आप सामाजिक मुद्दों पर बनी फिल्में देखना पसंद करते हैं, तो इसे एक बार देख सकते हैं। 

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