पूरब-पश्चिम में अजेय भाजपा: दक्षिण भारत के समीकरणों ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की चिंताएं बढ़ा दी
भारतीय राजनीति के हालिया घटनाक्रम और चुनावी नतीजों के विश्लेषण से साफ है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) देश के पूर्वी और पश्चिमी राज्यों में अपना अजेय रथ थामने में सफल रही है। हालांकि, दक्षिण भारत के समीकरणों ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की चिंताएं बढ़ा दी हैं। तमिलनाडु में के. अन्नामलाई के राजनीतिक परिदृश्य से हटने और कर्नाटक में कांग्रेस के संकटमोचक डी.के. शिवकुमार की मजबूत स्थिति ने दक्षिण में भाजपा के ‘मिशन साउथ’ को बड़ा झटका दिया है।
पूरब और पश्चिम में भाजपा का दबदबा बरकरार
देश के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों में भाजपा का सांगठनिक ढांचा और चुनावी रणनीति बेहद मजबूत साबित हुई है। पश्चिमी भारत—विशेष रूप से गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्यों में भाजपा का गढ़ अभेद्य बना हुआ है। वहीं, पूर्वी भारत के राज्यों जैसे ओडिशा, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर में पार्टी ने अपनी पैठ को और मजबूत किया है। इन क्षेत्रों में विपक्ष का कोई भी गठबंधन भाजपा के सामाजिक समीकरणों और राष्ट्रवाद के नैरेटिव को भेदने में नाकाम रहा है, जिससे पार्टी यहां पूरी तरह अजेय नजर आ रही है।
दक्षिण में गड़बड़ाए समीकरण और अन्नामलाई की विदाई
इसके विपरीत, दक्षिण भारत में भाजपा के समीकरण पूरी तरह उलझ गए हैं। तमिलनाडु में भाजपा का चेहरा बनकर उभरे और आक्रामक राजनीति के लिए जाने जाने वाले के. अन्नामलाई की विदाई (या सांगठनिक फेरबदल) ने पार्टी के कैडर को थोड़ा निराश किया है। अन्नामलाई ने अपनी ‘एन मन, एन मक्कल’ (मेरा देश, मेरे लोग) पदयात्रा के जरिए राज्य में भाजपा को एक मजबूत विकल्प के रूप में खड़ा करने की कोशिश की थी। द्रविड़ राजनीति के गढ़ में उनके अचानक नेपथ्य में जाने से पार्टी की जमीनी तैयारियों को करारा झटका लगा है।
कर्नाटक में शिवकुमार की ताजपोशी से लगा झटका
दक्षिण भारत के एकमात्र ‘कमल’ वाले राज्य कर्नाटक में भी भाजपा की राह अब और मुश्किल हो गई है। कांग्रेस के कद्दावर नेता डी.के. शिवकुमार की बढ़ती राजनीतिक ताकत और राज्य की कमान पर उनकी मजबूत पकड़ ने भाजपा के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। शिवकुमार को दक्षिण की राजनीति में कांग्रेस का सबसे बड़ा रणनीतिकार माना जाता है, और उनकी ताजपोशी (या बढ़ते कद) ने यह साफ कर दिया है कि आगामी चुनावों में कांग्रेस को मात देना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा। जेडीएस (JDS) के साथ गठबंधन के बावजूद भाजपा कर्नाटक में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए संघर्ष करती दिख रही है।
‘मिशन साउथ’ के लिए बड़ी चुनौती
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में क्षेत्रीय दलों (वाईएसआरसीपी, टीडीपी और बीआरएस) के मजबूत प्रभाव के बीच केरल में पैर जमाने की कोशिशें अभी भी उम्मीद के मुताबिक रंग नहीं ला पाई हैं। ऐसे में तमिलनाडु और कर्नाटक के इन नए राजनीतिक बदलावों ने भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। स्पष्ट है कि जहां पूरब और पश्चिम भाजपा को मजबूती दे रहे हैं, वहीं दक्षिण की राजनीति अब भी पार्टी के लिए एक पहेली बनी हुई है।


