पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने न केवल भारतीय राजनीति की धुरी बदल दी है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय विमर्शमें भी एक नई बहस छेड़ दी है। भाजपा द्वारा ममता बनर्जी के 15 साल पुराने किले को ध्वस्त कर 207 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल करना एक ऐतिहासिक घटना है। हालांकि, जैसे ही चुनाव परिणाम स्पष्ट हुए, न्यूयॉर्क टाइम्स, बीबीसी और गार्जियन जैसे विदेशी मीडिया संस्थानों ने इसे ‘हिंदू राष्ट्रवाद की जीत’ और ‘ध्रुवीकरण का परिणाम’ बताना शुरू कर दिया।
विदेशी मीडिया के इस एकतरफा नैरेटिव के पीछे अक्सर भारत की जटिल सामाजिक-राजनीतिक बुनावट को समझने की कमी या एक पूर्व-निर्धारित नजरिया होता है। लेकिन क्या बंगाल का यह जनादेश वाकई केवल ‘धार्मिक ध्रुवीकरण’ था? जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है।
1. विकास और रोजगार की आकांक्षा
बंगाल के चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा ‘फ्लाइट ऑफ इंडस्ट्रीज’ (उद्योगों का पलायन) और बेरोजगारी था। टीएमसी सरकार पर सालों से शिक्षक भर्ती घोटाले जैसे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे थे। भाजपा ने अपने अभियान में ‘सोनार बांग्ला’ के तहत औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन का जो खाका खींचा, उसने युवा मतदाताओं को आकर्षित किया। विदेशी मीडिया अक्सर इन आर्थिक पहलुओं को नजरअंदाज कर इसे केवल पहचान की राजनीति तक सीमित कर देता है।
2. एंटी-इंकंबेंसी और सुशासन की मांग
15 वर्षों के शासन के बाद ममता बनर्जी की सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) चरम पर थी। कानून-व्यवस्था की स्थिति और महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों ने ग्रामीण बंगाल में भी असंतोष पैदा किया। भाजपा ने सुरक्षा और पारदर्शी प्रशासन का वादा किया, जिसे जनता ने एक विकल्प के रूप में स्वीकार किया।
3. महिला और अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध
विदेशी मीडिया का दावा है कि अल्पसंख्यक वोट एकजुट थे, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि इस बार अल्पसंख्यक मतों में भारी बिखराव हुआ। लेफ्ट-आईएसएफ गठबंधन और कांग्रेस की सक्रियता ने टीएमसी के पारंपरिक वोट बैंक को तोड़ा। वहीं, भाजपा ने महिलाओं के लिए कल्याणकारी योजनाओं को दोगुना करने का वादा कर ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं की काट ढूंढ ली।
4. उप-राष्ट्रवाद का कार्ड हुआ फेल
टीएमसी ने ‘बंगाली बनाम बाहरी’ का जो नैरेटिव 2021 में सफलतापूर्वक चलाया था, वह 2026 में बेअसर रहा। मतदाताओं ने यह संदेश दिया कि वे संस्कृति के साथ-साथ विकास और राष्ट्रीय मुख्यधारा से जुड़ाव चाहते हैं।
विदेशी मीडिया जब बंगाल के नतीजों को ‘हिंदू राष्ट्रवाद की धंधु’ में लपेटकर पेश करता है, तो वह उन करोड़ों मतदाताओं के विवेक का अपमान करता है जिन्होंने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और कुशासन के खिलाफ वोट दिया है। यह जीत केवल किसी एक विचार की नहीं, बल्कि बंगाल में ‘परिवर्तन’ की तीव्र आकांक्षा की जीत है। विदेशी मीडिया को यह समझना होगा कि भारत का लोकतंत्र अब केवल भावनाओं पर नहीं, बल्कि ‘डिलीवरी’ और ‘रिपोर्ट कार्ड’ पर वोट करता है।


