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    हर्षदीप सिंह की कहानी: भाई को देखकर सेना में जाने का जुनून, 17 बार मिली नाकामी, तीनों सेनाओं से जुड़ा परिवार

    कहते हैं कि सफलता पाने के लिए प्रतिभा से ज्यादा जरूरी लगातार कोशिश करते रहना है। भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट बने हर्षदीप सिंह की कहानी इस बात को साबित करती है। उन्होंने सैन्य अधिकारी बनने के अपने सपने को पूरा करने के लिए एक-दो नहीं, बल्कि 17 बार असफलता का सामना किया। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और आखिरकार 18वीं कोशिश में सफलता हासिल कर ली। हर्षदीप की उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि उनका परिवार देश की तीनों सेनाओं से जुड़ गया है। उनके पिता भारतीय वायु सेना में सेवा दे रहे हैं, जबकि उनके बड़े भाई भारतीय नौसेना में कार्यरत हैं। अब हर्षदीप के भारतीय सेना में अधिकारी बनने के साथ परिवार की यह सैन्य परंपरा थल सेना तक भी पहुंच गई है।

    भाई को देखकर आया सेना में जाने का जुनून

    हर्षदीप के लिए सेना में जाने की प्रेरणा उनके परिवार से ही मिली। बड़े भाई को नौसेना की वर्दी में देखकर उनके भीतर भी देशसेवा का जज्बा पैदा हुआ। पिता पहले से ही वायु सेना में होने के कारण सैन्य जीवन और अनुशासन उनके लिए कोई नई चीज नहीं थी। इसी माहौल ने उनके मन में सशस्त्र सेनाओं में करियर बनाने की इच्छा को मजबूत किया।

    लेकिन मंजिल तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं रहा। चयन प्रक्रिया में उन्हें लगातार असफलताओं का सामना करना पड़ा। 17 बार असफल होने के बावजूद उन्होंने प्रयास बंद नहीं किए। हर नाकामी के बाद उन्होंने खुद को दोबारा तैयार किया और अगले अवसर की तैयारी में जुट गए।

    18वीं कोशिश बनी कामयाबी की वजह

    आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और 18वें प्रयास में उनका चयन भारतीय सेना के अधिकारी के तौर पर हो गया। लेफ्टिनेंट बनने के साथ हर्षदीप ने न केवल अपना सपना पूरा किया, बल्कि अपने परिवार की सैन्य विरासत को भी आगे बढ़ाया।

    उनकी कहानी यह संदेश देती है कि किसी परीक्षा या चयन प्रक्रिया में मिली असफलता को अंतिम परिणाम नहीं माना जाना चाहिए। कई बार सफलता तक पहुंचने के लिए उम्मीद से कहीं ज्यादा प्रयास करने पड़ते हैं।

    हर्षदीप का सफर खास तौर पर उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो प्रतियोगी परीक्षाओं या चयन प्रक्रियाओं में लगातार असफलताओं से निराश हो जाते हैं। 17 बार की नाकामी के बाद 18वीं कोशिश में मिली सफलता बताती है कि असफलता मंजिल का अंत नहीं, बल्कि अगली कोशिश की शुरुआत हो सकती है।

    इस तरह एक ही परिवार में पिता का वायु सेना, भाई का नौसेना और हर्षदीप का थल सेना में होना देश की तीनों सेनाओं के प्रति परिवार की प्रतिबद्धता की प्रेरक तस्वीर पेश करता है।

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