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    बांग्लादेश ने चीन को सौंपा मोंगला बंदरगाह, जानें भारत के हाथ से कैसे फिसला प्रोजेक्ट?

    बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद से भारत और बांग्लादेश के कूटनीतिक रिश्तों में बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की हालिया चीन यात्रा के दौरान दोनों देशों ने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मोंगला बंदरगाह (Mongla Port) के पास एक आर्थिक क्षेत्र (Economic Zone) विकसित करने के समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। यह घटनाक्रम भारत की सुरक्षा और भू-राजनीतिक मोर्चे के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बन गया है।

    2018 में बंदरगाह को विकसित करने का ठेका दिया था

    • 2015 का ऐतिहासिक समझौता: साल 2015 में तत्कालीन शेख हसीना सरकार और भारत के बीच मोंगला और चटगांव में दो भारतीय आर्थिक क्षेत्र विकसित करने का समझौता हुआ था। साल 2018 में भारत सरकार ने हीरानंदानी ग्रुप को मोंगला बंदरगाह को विकसित करने का ठेका भी दे दिया था।
    • तख्तापलट और भारत से दूरी: अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के तख्तापलट के बाद बनी मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने भारत के प्रति कड़ा रुख अपनाया। बांग्लादेशी अधिकारियों के अनुसार, भारतीय डेवलपर द्वारा तय समय-सीमा में काम शुरू न कर पाने का हवाला देकर इस प्रोजेक्ट को रद्द (Delist) कर दिया गया था। अब प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार ने इसी 110 एकड़ भूमि को चीनी सरकारी कंपनी को सौंप दिया है।

    भारत के लिए क्यों है यह ‘खतरे की घंटी’?

    1. भारत की सीमा से बेहद नजदीकी:

    मोंगला बंदरगाह बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा और व्यस्त समुद्री पोर्ट है। इसकी भौगोलिक स्थिति भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता है; यह भारतीय जल सीमा से महज 130 किलोमीटर और जमीनी सीमा से सिर्फ 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। कोलकाता से इसकी दूरी केवल 188 किलोमीटर है। इतने नजदीक चीन की मौजूदगी भारत के पूर्वी तट की सुरक्षा को सीधे प्रभावित करती है।

    2. सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) और तीस्ता का खतरा:

    इस समझौते के साथ ही बांग्लादेश ने भारत की सीमा के बेहद करीब तीस्ता नदी प्रबंधन और बहाली परियोजना में भी चीन को शामिल करने पर सहमति जताई है। यह क्षेत्र भारत के ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ (चिकन नेक) के बेहद पास है, जो उत्तर-पूर्वी राज्यों को मुख्य भारत से जोड़ता है। इस संवेदनशील क्षेत्र के नजदीक चीन का इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा होना रणनीतिक रूप से खतरनाक है।

    3. ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (String of Pearls) का विस्तार:

    चीन लंबे समय से हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में भारत को चारों तरफ से घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है। वह पहले ही:

    • पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट
    • श्रीलंका के हंबनटोटा पोर्ट
    • पूर्वी अफ्रीका के जिबूती में अपने सैन्य व व्यावसायिक पैर जमा चुका है।

    निगरानी और जासूसी का जोखिम: यद्यपि चीन और बांग्लादेश इस प्रोजेक्ट को पूरी तरह से व्यावसायिक बता रहे हैं, लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे ‘डुअल-यूज़’ (दोहरे उपयोग वाले) बंदरगाहों का इस्तेमाल चीनी नौसेना भविष्य में भारतीय सैन्य गतिविधियों की जासूसी, खुफिया जानकारी जुटाने और सर्विलांस के लिए आसानी से कर सकती है।

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