मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच विवाद के बीच कॉकरेच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर सवाल उठाए हैं। दिपके ने पूछा है कि ज्ञानेश कुमार सरकार के लिए इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं कि उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन रोकने के लिए दिल्ली में सुरक्षा के इतने कड़े इंतजाम किए जा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार अपने ही नागरिकों को विरोधी मानकर उनके खिलाफ कार्रवाई कर रही है।
ज्ञानेश कुमार को लेकर क्यों बढ़ा विवाद?
इस विवाद की मुख्य वजह मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) को लेकर उठे सवाल हैं। सीजेपी और अन्य आलोचकों का आरोप है कि इस प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। पार्टी का दावा है कि विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 13 करोड़ से अधिक नाम ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से बाहर हुए हैं। इस आधार पर संगठन ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त की जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं।
दिपके की मांग है कि ज्ञानेश कुमार इस मामले में जिम्मेदारी लें और अपने पद से इस्तीफा दें। उनके मुताबिक, मतदाता सूची से जुड़े फैसलों की पारदर्शिता सुनिश्चित करना जरूरी है, क्योंकि इसका सीधा संबंध नागरिकों के मतदान के अधिकार से है। दूसरी ओर, चुनाव आयोग की ओर से नामों की जांच और पुनरीक्षण को चुनावी सूचियों को दुरुस्त करने की प्रक्रिया के तौर पर देखा गया है। इसलिए नाम हटाए जाने के आंकड़ों, उनके कारणों और प्रभावित मतदाताओं की स्थिति की स्वतंत्र जांच इस विवाद के महत्वपूर्ण पहलू हैं।
दिल्ली में सुरक्षा इंतजामों पर भी सवाल
सीजेपी के प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी किए जाने, सड़कों पर बैरिकेडिंग और परिवहन सेवाओं पर पाबंदियों को लेकर भी बहस छिड़ी। दिपके ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए रेलवे और मेट्रो सेवाओं को प्रभावित करने तथा इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध जैसे कदम उठाए गए। उन्होंने सवाल किया कि यदि सरकार का उद्देश्य आम लोगों को असुविधा से बचाना है, तो विरोध प्रदर्शन रोकने के लिए उठाए गए कदमों से आम नागरिकों को होने वाली परेशानी का जवाब कौन देगा?
दिपके ने मौजूदा हालात की तुलना आपातकाल के दौर से करते हुए कहा कि सरकार को नागरिकों की आवाज सुननी चाहिए, न कि विरोध को दबाने के लिए सख्ती का सहारा लेना चाहिए। उनका कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को अपनी मांग रखने का अवसर देता है। हालांकि, किसी भी प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है। विवाद इसी बात पर है कि सुरक्षा उपायों और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।


