पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों पर चीन और तुर्की के भारी सैन्य परिवहन विमानों (Military Transport Aircraft) की लगातार 60 घंटों तक अनूठी और संदिग्ध आवाजाही देखी गई है। इस अप्रत्याशित सैन्य एयरलिफ्ट (Airlift) के बाद भारतीय खुफिया और सुरक्षा एजेंसियां हाई अलर्ट पर हैं। भारतीय सुरक्षा बल और निगरानी तंत्र पश्चिमी सीमा तथा हवाई क्षेत्र पर हर मूवमेंट पर पैनी नजर बनाए हुए हैं। 60 घंटों की यह ‘असामान्य’ आवाजाही सामान्य द्विपक्षीय सैन्य आदान-प्रदान के बजाय किसी बड़े रणनीतिक लॉजिस्टिकल बैकअप की ओर इशारा करती है।
संदिग्ध आवाजाही और मुख्य बिंदु
- 60 घंटे का एयरलिफ्ट ऑपरेशन: सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, चीन और तुर्की के भारी सैन्य ट्रांसपोर्ट विमानों ने रावलपिंडी स्थित नूर खान एयरबेस और कराची के मसरूर एयरबेस पर लगातार उड़ानें भरीं और कई चक्कर लगाए।
- हथियारों और ड्रोनों की डिलीवरी की आशंका: खुफिया अधिकारियों और रिपोर्ट्स के मुताबिक, 60 घंटे की इस हलचल का संबंध पाकिस्तान को नए उन्नत सैन्य उपकरणों, स्टील्थ ड्रोनों (Drones), इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर किट्स और एयर डिफेंस सिस्टम की डिलीवरी से हो सकता है।
- एयर डिफेंस की भरपाई: विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले सैन्य तनाव के दौरान क्षतिग्रस्त हुए पाकिस्तानी रक्षा तंत्र (जैसे HQ-9B एयर डिफेंस सिस्टम) की भरपाई के लिए चीन ने यह त्वरित सैन्य आपूर्ति की हो सकती है।
रणनीतिक संदर्भ और भारत पर असर
- त्रिस्तरीय गुटबंदी (Trilateral Axis): यह घटनाक्रम अगस्त में पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब/चीन के बीच हुए रक्षा समझौतों व उच्चस्तरीय सैन्य वार्ताओं के तुरंत बाद सामने आया है।
- गैर-पारंपरिक और टेक्नोलॉजी-आधारित युद्ध क्षमता: पाकिस्तान अपनी सेना को आधुनिक तकनीक, सटीक मिसाइल प्रणाली और मानव रहित (Unmanned) ड्रोन हथियारों से लैस करने के लिए चीन और तुर्की पर तेजी से निर्भर हो रहा है।


