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    तीजनबाई: तंबूरा बना पहचान, दुनिया ने माना लोहा, पंडवानी की वजह से टूट गई थी शादी

    तीजनबाई ने इंदिरा गांधी को दिया था जवाब, ‘मैं महाभारत नहीं करती, महाभारत की कथा सुनाती हूं’

    पद्मविभूषण से सम्मानित छत्तीसगढ़ की प्रख्यात पंडवानी गायिका डॉ. तीजनबाई आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोक कला ‘पंडवानी’ को न केवल देश में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। हालांकि, एक महिला कलाकार के रूप में सफलता के इस शिखर तक पहुंचने का उनका सफर बेहद संघर्षपूर्ण और कांटों भरा रहा। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से उनकी मुलाकात का एक बेहद दिलचस्प किस्सा और कला के प्रति उनकी दीवानगी के कारण टूटे रिश्तों की दास्तान आज भी लोगों को प्रेरणा देती है।

    जब इंदिरा गांधी ने पूछा- ‘तुम रोज महाभारत करती हो?’

    तीजनबाई के जीवन का सबसे यादगार संस्मरण देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से जुड़ा है। तीजनबाई ने एक साक्षात्कार में बताया था कि जब वे पहली बार दिल्ली में अपनी कला का प्रदर्शन करने गईं, तो वहां इंदिरा गांधी भी मौजूद थीं। तीजनबाई के सशक्त अभिनय और बुलंद आवाज से इंदिरा गांधी इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने तीजनबाई को अपने पास बुलाया।

    इंदिरा गांधी ने मजाकिया और कौतूहल भरे लहजे में तीजनबाई से पूछा, “सुना है तुम रोज महाभारत करती हो?” इस पर तीजनबाई ने बेहद सादगी और निडरता से मुस्कुराते हुए जवाब दिया था, “मैं घर में महाभारत नहीं करती, मैं तो मंच पर महाभारत की शौर्य गाथा सुनाती हूं।” तीजनबाई का यह हाजिरजवाबी और सरल अंदाज इंदिरा गांधी को बेहद पसंद आया और उन्होंने तीजनबाई की पीठ थपथपाई। इसके बाद से ही तीजनबाई को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान मिलनी शुरू हुई।

    पंडवानी की वजह से समाज से हुईं बहिष्कृत, टूट गई थी शादी

    आज भले ही तीजनबाई को दुनिया पूजती है, लेकिन एक दौर ऐसा था जब उनके अपनों ने ही उनका साथ छोड़ दिया था। छत्तीसगढ़ के गनियारी गांव में जन्मी तीजनबाई ने जब पार पारंपरिक रूप से पुरुषों द्वारा गाए जाने वाले ‘कापालिक’ शैली में पंडवानी गाना शुरू किया, तो समाज को यह नागवार गुजरा। उस दौर में किसी महिला का हाथ में तंबूरा लेकर मंच पर खड़े होकर वीर रस में गाना सामाजिक नियमों के खिलाफ माना जाता था।

    कला के प्रति उनकी इसी जिद के कारण उनके पति और ससुराल वालों ने उन पर पंडवानी छोड़ने का दबाव बनाया। जब तीजनबाई ने अपनी कला से समझौता करने से साफ इनकार कर दिया, तो उनके पति ने उन्हें छोड़ दिया और उनकी शादी टूट गई। इतना ही नहीं, पारधी समाज की पंचायत ने उन्हें बिरादरी और गांव से भी बहिष्कृत (बाहर) कर दिया था। समाज के इस विरोध के बावजूद तीजनबाई ने हार नहीं मानी। उन्होंने गांव के बाहर एक छोटी सी झोपड़ी बनाई और भूखे-प्यासे रहकर भी अपनी साधना जारी रखी।

    तंबूरा बना पहचान, दुनिया ने माना लोहा

    तमाम सामाजिक बेड़ियों को तोड़ते हुए तीजनबाई ने अपने हाथ के तंबूरे को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। वे मंच पर तंबूरे को कभी अर्जुन का गांडीव धनुष, कभी भीम की गदा तो कभी दुशासन की तलवार बनाकर जीवंत अभिनय करती थीं। उनकी इसी अनूठी शैली ने उन्हें विश्व प्रसिद्ध बना दिया।

    भारत सरकार ने उनकी कला और अद्वितीय संघर्ष को सलाम करते हुए उन्हें पद्म श्री (1988), पद्म भूषण (2003) और देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण (2019) से नवाजा। तीजनबाई की कहानी यह साबित करती है कि अगर इरादे फौलादी हों, तो समाज की रूढ़िवादी दीवारें भी कला के आगे घुटने टेक देती हैं।

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