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    पद्मश्री सुलागिट्टी नरसम्मा: अभावों में बीता बचपन, बिना डिग्री के ले आईं सामाजिक क्रांति

    मानवता, निस्वार्थ सेवा और समर्पण की जब भी बात होगी, कर्नाटक की सुलागिट्टी नरसम्मा का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में चमकता रहेगा। कर्नाटक के एक बेहद पिछड़े और छोटे से गांव से ताल्लुक रखने वाली नरसम्मा ने अपनी जिंदगी के 70 साल से अधिक का समय ग्रामीण और जरूरतमंद माताओं के सुरक्षित प्रसव (Child Delivery) कराने में समर्पित कर दिया। नरसम्मा का निधन 25 दिसंबर 2018 को 98 साल की उम्र में हुआ। उनके पास न तो कोई आधुनिक मेडिकल डिग्री थी, न ही उन्होंने कभी किसी बड़े अस्पताल की चौखट लांघी और सबसे बड़ी बात—उन्होंने इस पवित्र सेवा के लिए कभी किसी से एक पैसा भी फीस के रूप में नहीं लिया। अपनी अंतिम सांस तक वह 15,000 से अधिक बच्चों को इस दुनिया में सुरक्षित लाने का जरिया बनीं। उनकी यह कहानी केवल प्रसव कराने की नहीं, बल्कि एक अकेले व्यक्ति द्वारा पूरे समाज के प्रति असीम दया, सेवा और बदलाव की एक असाधारण गाथा है।

    सुलागिट्टी नरसम्मा: जीवन परिचय एवं मुख्य बिंदु

    मुख्य विवरणजानकारी
    जन्म और स्थानवर्ष 1920, कृष्णापुरा गांव (पावगाडा तालुका, तुमकुरु जिला, कर्नाटक)
    समुदाय और भाषाआदि जंबावा समुदाय, मातृभाषा – तेलुगु
    वैवाहिक जीवन12 वर्ष की उम्र में अंजीनप्पा से विवाह, कुल 12 बच्चे (4 का बचपन में निधन)
    कुल सुरक्षित प्रसव70 वर्षों में 15,000 से अधिक सफल डिलीवरी
    सर्वोच्च सम्मानभारत सरकार द्वारा ‘पद्मश्री’ पुरस्कार (वर्ष 2018)

    अभावों के बीच बीता बचपन और पारंपरिक ज्ञान की विरासत

    सुलागिट्टी नरसम्मा का जन्म 1920 में कर्नाटक के तुमकुरु जिले के एक सुदूर और पिछड़े ग्रामीण इलाके कृष्णापुरा में हुआ था। वह आदि जंबावा समुदाय से थीं और उनके परिवार में तेलुगु भाषा बोली जाती थी। उन दिनों ग्रामीण भारत में लड़कियों के लिए शिक्षा के रास्ते लगभग बंद थे, जिसके कारण नरसम्मा कभी स्कूल नहीं जा सकीं। हालांकि, औपचारिक शिक्षा न मिलने के बावजूद उन्होंने अपने परिवार, विशेषकर अपनी दादी से पारंपरिक चिकित्सा, जड़ी-बूटियों और गर्भवती महिलाओं की देखभाल का वह अनमोल ज्ञान सीखा, जो आगे चलकर हजारों जिंदगियों के लिए वरदान साबित हुआ।

    महज 12 वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह अंजीनप्पा से कर दिया गया। नरसम्मा का अपना पारिवारिक जीवन भी आसान नहीं था; उन्होंने 12 बच्चों को जन्म दिया, जिनमें से चार बच्चों को उन्होंने बहुत कम उम्र में ही खो दिया। इस व्यक्तिगत दुख ने शायद उनके भीतर माताओं और बच्चों के प्रति संवेदनशीलता को और गहरा कर दिया। आगे चलकर वह एक भरे-पूरे परिवार की मुखिया बनीं, जिसमें उनके कई पोते-पोतियां और परपोते-परपोतियां शामिल थे।

    ‘सुलागिट्टी’ बनने का सफर और निस्वार्थ सेवा का संकल्प

    कन्नड़ भाषा में ‘सुलागिट्टी’ शब्द का अर्थ ‘दाई’ (Midwife) होता है। नरसम्मा के इस काम की शुरुआत तब हुई जब उन्होंने अपने गांव और आसपास के क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में गर्भवती महिलाओं को तड़पते और दम तोड़ते देखा। उन दिनों न तो सड़कें अच्छी थीं और न ही पास में कोई अस्पताल था। ऐसे में नरसम्मा ने बिना किसी आधुनिक उपकरणों के, केवल अपने हाथों के स्पर्श और नाड़ी देखकर गर्भ में बच्चे की स्थिति का सटीक अंदाजा लगाने की अद्भुत कला सीखी।

    • मुफ्त सेवाएं: उन्होंने कभी भी अपनी सेवा को व्यवसाय नहीं बनाया। चाहे आधी रात का समय हो, कड़ाके की ठंड हो या मूसलाधार बारिश, जब भी किसी मां को उनकी जरूरत होती, वह तुरंत दौड़ पड़ती थीं।
    • पारंपरिक जड़ी-बूटियां: प्रसव के बाद मां और नवजात शिशु की सुरक्षा के लिए वह खुद जंगलों से जड़ी-बूटियां चुनकर लाती थीं और दवाइयां तैयार करती थीं।

    नरसम्मा की सेवा सिर्फ एक डॉक्टर या दाई जैसी नहीं थी, बल्कि वह उन गरीब माताओं के लिए एक मां और रक्षक की तरह थीं, जिनके पास अस्पताल जाने के पैसे नहीं होते थे। 70 सालों तक बिना रुके और बिना थके उन्होंने इस काम को अंजाम दिया।

    जब देश ने पहचाना ‘ममता का यह साम्राज्य’

    दशकों तक गुमनामी में रहकर चुपचाप मानवता की सेवा करने वाली नरसम्मा की कहानी जब धीरे-धीरे राज्य और फिर राष्ट्रीय स्तर पर सामने आई, तो हर कोई उनके सामने नतमस्तक हो गया। वर्ष 2018 में, भारत सरकार ने उनकी निस्वार्थ सेवाओं और समाज के प्रति असाधारण योगदान को सर्वोच्च सम्मान देते हुए उन्हें देश के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से नवाजा।

    राष्ट्रपति भवन के भव्य गलियारे में जब यह साधारण ग्रामीण महिला पद्मश्री लेने पहुंची, तो वह पूरे देश के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा प्रतीक बन गईं। 98 वर्ष की आयु में (दिसंबर 2018) उनका निधन हो गया, लेकिन उनका जीवन आज भी हमें यह सिखाता है कि समाज में बड़ा बदलाव लाने के लिए किसी बड़ी डिग्री या धन-दौलत की नहीं, बल्कि केवल एक साफ दिल और अटूट सेवा भाव की आवश्यकता होती है।

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