More
    HomeHindi NewsDelhi News'अलनीनो' ने भारत की ओर बढ़ाए कदम, जुलाई, अगस्त और सितंबर पड़...

    ‘अलनीनो’ ने भारत की ओर बढ़ाए कदम, जुलाई, अगस्त और सितंबर पड़ सकते हैं भारी

    El Nino Effect in India: प्रशांत महासागर के भीतर पानी के तापमान में हो रही तेजी से हलचल और समुद्र की सतह पर बनते चक्रवाती बदलावों ने वैश्विक मौसम वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। यह मौसमी बदलाव कुछ और नहीं बल्कि ‘अलनीनो’ (El Nino) है, जिसने अब एशिया और विशेषकर भारत की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, भारत के लिए आने वाले तीन महीने (जुलाई, अगस्त और सितंबर) बेहद भारी पड़ सकते हैं, क्योंकि अलनीनो के कारण इस साल मानसून के गंभीर रूप से कमजोर होने की आशंका है।

    पूरी दुनिया के मौसम चक्र को बिगाड़ देता है बदलाव

    वैज्ञानिक भाषा में इसे ‘अलनीनो-सदर्न ऑसिलेशन’ (ENSO) कहा जाता है। सामान्य दिनों में प्रशांत महासागर में व्यापारिक हवाएं (Trade Winds) पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं, जिससे गर्म पानी पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में जमा होता है। लेकिन जब ये हवाएं कमजोर पड़ती हैं, तो समुद्र की सतह का गर्म पानी पूर्व की ओर यानी दक्षिण अमेरिका की तरफ बढ़ने लगता है। इस प्रक्रिया में समुद्र के भीतर तापमान का एक बड़ा चक्रवात या गर्म पानी का घेरा गोल-गोल घूमने जैसा प्रतीत होता है। महासागर के तापमान में होने वाला यही बदलाव पूरी दुनिया के मौसम चक्र को बिगाड़ देता है।

    भारत पर क्यों भारी पड़ेंगे अगले 3 महीने?

    भारतीय मौसम विभाग (IMD) और वैश्विक पर्यावरण शोधों के अनुसार, इस बार का अलनीनो ‘सुपर अलनीनो’ का रूप ले सकता है, जिससे प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से 2.5 डिग्री सेल्सियस तक ऊपर जा सकता है। इसका भारत पर सीधा असर पड़ेगा:

    1. जुलाई से सितंबर का संकट: भारत में मानसूनी बारिश का मुख्य समय जुलाई, अगस्त और सितंबर होता है। अलनीनो के मजबूत होने से इन तीन महीनों में बारिश सामान्य से काफी कम रहने के आसार हैं।
    2. शुरुआती झटके: जून के शुरुआती हफ्तों में ही इसका असर दिखने लगा है। महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सामान्य से 70-80 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है। मध्य और उत्तर भारत में भी प्री-मानसून और मानसून की शुरुआत बेहद कमजोर रही है।
    3. जलाशयों का सूखना: बारिश न होने से देश की नदियों, तालाबों और बांधों (जलाशयों) में पानी का स्तर तेजी से गिरेगा, जिससे आने वाले समय में पेयजल और बिजली संकट गहरा सकता है।

    कृषि और अर्थव्यवस्था पर ‘दोहरी मार’

    भारत की लगभग 50 से 60 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती-किसानी से जुड़ी है। खरीफ सीजन में देश में धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालों की बड़े पैमाने पर बुवाई होती है।

    • फसलों की बर्बादी: यदि मुख्य मानसूनी महीनों में बारिश 90 फीसदी या उससे कम रहती है, तो खाद्यान्न उत्पादन में 10 से 15 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आ सकती है।
    • प्रभावित राज्य: अलनीनो का सबसे ज्यादा असर मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे 12 राज्यों पर पड़ेगा, जहां की खेती पूरी तरह बारिश पर निर्भर है।

    150 साल पुराना खौफनाक इतिहास

    ‘जर्नल ऑफ क्लाइमेट’ की रिपोर्ट्स के मुताबिक, आज से करीब 150 साल पहले (1876 से 1878 के बीच) दुनिया ने एक ऐसा ही भयंकर ‘सुपर अलनीनो’ देखा था। उस दौरान आए विनाशकारी सूखे और महा-अकाल (Great Famine) के कारण भारत, एशिया और अफ्रीका में करीब 5 करोड़ लोगों की जान चली गई थी।

    राहत की उम्मीद: हालांकि, मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि आज की आधुनिक कृषि तकनीक और सैटेलाइट मॉनिटरिंग के कारण 150 साल पहले जैसे अकाल के हालात तो नहीं बनेंगे। इसके अलावा यदि हिंद महासागर में ‘पॉजिटिव इंडियन ओशन डाइपोल’ (IOD) विकसित होता है, तो वह अलनीनो के इस विनाशकारी असर को कुछ हद तक कम जरूर कर सकता है। फिर भी, पानी की किल्लत और खेती को होने वाले नुकसान से इंकार नहीं किया जा सकता।

    RELATED ARTICLES

    Most Popular

    Recent Comments