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    ट्रंप को न्यायपालिका से बड़ा झटका, भारी टैरिफ को बताया शक्तियों का अतिक्रमण

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आर्थिक एजेंडे को न्यायपालिका से एक बड़ा झटका लगा है। वाशिंगटन स्थित ‘यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड’ ने राष्ट्रपति के उस विवादास्पद कार्यकारी आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत विदेशी आयात पर भारी टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने की घोषणा की गई थी। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति कार्यालय ने टैरिफ लागू करने के लिए व्यापार कानूनों की गलत व्याख्या की और अपनी शक्तियों का अतिक्रमण किया।

    अदालत के फैसले के मुख्य बिंदु


    व्यापार कानून का दुरुपयोग

    अदालत ने सुनवाई के दौरान राष्ट्रपति प्रशासन की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि ‘ट्रेड एक्सपेंशन एक्ट की धारा 232’ का इस्तेमाल केवल राष्ट्रीय सुरक्षा के वास्तविक खतरों के लिए किया जा सकता है।

    • कोर्ट की टिप्पणी: न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि प्रशासन यह साबित करने में विफल रहा कि सहयोगियों और प्रमुख व्यापारिक साझेदारों से होने वाला आयात अमेरिकी सुरक्षा के लिए किस प्रकार खतरा है।
    • प्रक्रियात्मक खामियां: अदालत ने पाया कि यह आदेश बिना उचित समीक्षा और उद्योग जगत के साथ परामर्श के जारी किया गया था, जो वैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन है।

    ट्रंप का ‘टैरिफ युद्ध’ और आर्थिक तर्क

    राष्ट्रपति ट्रंप ने पद संभालते ही ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत चीन, यूरोपीय संघ और मेक्सिको जैसे देशों से आने वाले सामानों पर 25% से 60% तक टैरिफ लगाने की वकालत की थी।

    • प्रशासन का पक्ष: ट्रंप प्रशासन का दावा था कि ये टैरिफ अमेरिकी विनिर्माण क्षेत्र को पुनर्जीवित करेंगे और व्यापार घाटे को कम करेंगे।
    • बाजार की प्रतिक्रिया: टैरिफ के डर से वैश्विक बाजारों में अस्थिरता देखी गई थी और कई अमेरिकी कंपनियों ने चेतावनी दी थी कि इससे कच्चे माल की लागत बढ़ेगी, जिसका बोझ अंततः अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।

    व्हाइट हाउस की तीखी प्रतिक्रिया

    अदालत के फैसले के तुरंत बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने सोशल मीडिया पर इसे “पक्षपाती फैसला” करार देते हुए कहा कि यह “अमेरिकी श्रमिकों के खिलाफ एक साजिश” है। व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि वे इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे।


    वैश्विक और घरेलू प्रभाव

    • व्यापारिक साझेदारों को राहत: भारत, चीन और यूरोपीय संघ के लिए यह फैसला एक बड़ी राहत लेकर आया है। इन देशों को डर था कि नए टैरिफ से उनकी अर्थव्यवस्थाओं को अरबों डॉलर का नुकसान होगा।
    • अमेरिकी राजनीति: विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला ट्रंप की आर्थिक नीतियों पर एक बड़ा कानूनी अंकुश है। इससे विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी को भी प्रशासन को घेरने का मौका मिल गया है।

    आगे क्या होगा?

    अब सभी की निगाहें अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं। यदि वहां भी यह आदेश खारिज हो जाता है, तो ट्रंप को अपनी व्यापार नीतियों के लिए संसद (कांग्रेस) की मंजूरी लेनी होगी, जहाँ उनकी राह आसान नहीं होगी।

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