केरल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बाद कांग्रेस नीत यूडीएफ (UDF) की जीत तो हो गई है, लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान अब सार्वजनिक हो गई है। राज्य में नेतृत्व की यह लड़ाई अब पार्टी कार्यालयों से निकलकर सड़कों और सोशल मीडिया तक पहुँच चुकी है। इस बीच, आलाकमान द्वारा भेजे गए पर्यवेक्षकों ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को सौंप दी है।
समर्थकों का शक्ति प्रदर्शन
केरल के विभिन्न शहरों, विशेषकर तिरुवनंतपुरम और कोच्चि में प्रमुख दावेदारों के पक्ष में पोस्टर वार शुरू हो गया है।अलग-अलग गुटों के समर्थक अपने पसंदीदा नेता के समर्थन में रैलियां निकाल रहे हैं और उन्हें ‘जनता का मुख्यमंत्री’ बता रहे हैं। फेसबुक और एक्स (ट्विटर) पर हैशटैग कैंपेन चलाए जा रहे हैं, जिससे पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी खुलकर सामने आ गई है। वीडी सतीशन, केसी वेणुगोपाल और रमेश चेन्निथला के समर्थक सड़कों और सोशल मीडिया पर अपने नेताओं के समर्थन में खुलकर सामने आ गए हैं।
दिल्ली में होगा अंतिम फैसला
केरल में विधायकों की राय जानने के बाद केंद्रीय पर्यवेक्षकों ने दिल्ली लौटकर मल्लिकार्जुन खरगे के साथ लंबी बैठक की।
- पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट: रिपोर्ट में नवनिर्वाचित विधायकों की पसंद और राज्य के समीकरणों का जिक्र किया गया है। सूत्रों के मुताबिक, विधायकों की राय बंटी हुई है, जिसके कारण आम सहमति बनाना मुश्किल हो रहा है।
- आलाकमान का हस्तक्षेप: अब इस गतिरोध को खत्म करने के लिए राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ चर्चा के बाद अंतिम नाम पर मुहर लगेगी। आलाकमान किसी भी ऐसे फैसले से बचना चाहता है जिससे सरकार गठन से पहले ही गुटबाजी और बढ़ जाए।
प्रमुख दावेदार और समीकरण
मुख्यमंत्री की रेस में दो से तीन बड़े नाम (वीडी सतीशन, केसी वेणुगोपाल, शशि थरूर और रमेश चेन्निथला) शामिल हैं। एक ओर जहाँ अनुभवी नेतृत्व की बात की जा रही है, वहीं दूसरी ओर युवा चेहरों को आगे लाने की मांग भी उठ रही है। पार्टी के भीतर सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन (जातीय समीकरण) को ध्यान में रखना भी आलाकमान के लिए एक बड़ी चुनौती है।
कांग्रेस आलाकमान ने सभी गुटों को शांत रहने और सार्वजनिक बयानबाजी न करने की सख्त हिदायत दी है। उम्मीद जताई जा रही है कि अगले 24 से 48 घंटों में दिल्ली में होने वाली एक उच्च स्तरीय बैठक के बाद केरल के नए मुख्यमंत्री के नाम की आधिकारिक घोषणा कर दी जाएगी।
यह राजनीतिक अस्थिरता ऐसे समय में आई है जब गठबंधन के अन्य सहयोगी दल भी कैबिनेट में अपनी हिस्सेदारी को लेकर दबाव बना रहे हैं।


