नेपाल-तिब्बत सीमा पर हाल में ही आई विनाशकारी बाढ़ के बाद केंद्र सरकार ने भारतीय हिमालयी क्षेत्र (IHR) में सुरक्षात्मक कदम बढ़ा दिए हैं। भारत सरकार हिमालयी क्षेत्र की 188 सबसे संवेदनशील ग्लेशियल झीलों में अर्ली वार्निंग सिस्टम (Early Warning System – EWS) स्थापित करने की तैयारियों को तेज कर रही है, ताकि ‘ग्लेशियर झील फटने से आने वाली बाढ़’ (GLOF) के खतरे से समय रहते बचाव किया जा सके।
मुख्य बातें और बढ़ता खतरा:
- झीलों का तेजी से विस्तार: वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, 1990 से 2018 के बीच ग्लेशियल झीलों की संख्या में 53% और उनके सतही क्षेत्र (Surface Area) में 51% की भारी वृद्धि दर्ज की गई है।
- बड़ी आबादी पर जोखिम: दुनिया भर में लगभग 1.5 करोड़ लोग GLOF के सीधे खतरे वाले क्षेत्रों में रहते हैं। इस जोखिम का 50% से अधिक हिस्सा भारत, पाकिस्तान, पेरू और चीन में निवास करता है।
- हालिया विनाशकारी घटनाएं:
- अक्टूबर 2023: सिक्किम की साउथ ल्होनक ग्लेशियल झील फटने से भारी तबाही हुई थी।
- अगस्त 2024: नेपाल के खुम्बू क्षेत्र में थ्यानबो ग्लेशियल झील फटने से थामे गांव पूरी तरह तबाह हो गया था।
- 7,500 झीलों की मैपिंग: ISRO (NRSC), CWC, GSI, ICIMOD और UNDP जैसी प्रमुख संस्थाओं ने गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु नदी घाटियों में 7,500 से अधिक ग्लेशियल झीलों की पहचान और मैपिंग की है।
सरकार की योजना और तैयारी:
- सटीक निगरानी उपकरण: 188 चिन्हित संवेदनशील झीलों के पास ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन (AWS), वॉटर लेवल सेंसर और अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाए जाएंगे ताकि पानी का स्तर या मोरेन (प्राकृतिक बांध) टूटने के संकेत मिलते ही निचले इलाकों को अलर्ट किया जा सके।
- आपदा रोधी ढांचा: हिमालयी क्षेत्रों में बनने वाले हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स, सड़कों और बस्तियों को GLOF के संभावित प्रभावों से सुरक्षित करने के लिए नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDMA) और अन्य एजेंसियां दिशानिर्देश जारी कर रही हैं।
जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के कारण पिघलते ग्लेशियर अब हिमालयी राज्यों (जैसे उत्तराखंड, हिमाचल, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश) के लिए बड़ा जल-संकट और आपदा का कारण बन रहे हैं। अर्ली वार्निंग सिस्टम से निचले इलाकों में रहने वाले लाखों लोगों की जान-माल की रक्षा की जा सकेगी।


