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    UAE ‘ओपेक’ से बाहर निकला, NSA अजीत डोभाल ने ऐसे साधा, भारत को यह फायदा

    ग्लोबल एनर्जी पॉलिटिक्स में एक बड़े उलटफेर के तहत संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने तेल उत्पादक देशों के ताकतवर समूह ‘ओपेक’ (OPEC) और ‘ओपेक प्लस’ से बाहर निकलने का औपचारिक ऐलान कर दिया है। 1 मई 2026 से प्रभावी होने वाले इस फैसले के बीच भारत के लिए राहत की बड़ी खबर सामने आई है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस. जयशंकर की हालिया अबू धाबी यात्रा ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर एक मजबूत सुरक्षा कवच तैयार कर लिया है।

    अजीत डोभाल की कूटनीति और तेल की गारंटी

    हाल ही में (25-26 अप्रैल 2026) अजीत डोभाल ने यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से मुलाकात की। इस उच्च स्तरीय बैठक का मुख्य उद्देश्य पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में आपूर्ति बाधाओं के बीच भारत के लिए निर्बाध तेल और गैस की आपूर्ति सुनिश्चित करना था। यूएई के ओपेक छोड़ने के फैसले से अब वह उत्पादन कोटा के प्रतिबंधों से मुक्त हो जाएगा, जिससे वह भारत जैसे अपने रणनीतिक साझेदारों को अधिक मात्रा में कच्चा तेल उपलब्ध करा सकेगा।

    भारत के लिए इसके मायने क्या हैं?

    • सस्ते तेल की उम्मीद: ओपेक से बाहर होने के बाद यूएई अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाकर 50 लाख बैरल प्रतिदिन तक ले जाना चाहता है। बाजार में तेल की अधिक उपलब्धता से वैश्विक कीमतों में गिरावट आ सकती है, जिसका सीधा फायदा भारत के आयात बिल और महंगाई दर को मिलेगा।
    • ऊर्जा सुरक्षा: पश्चिम एशिया संकट के कारण सप्लाई चेन पर जो खतरा मंडरा रहा था, उसे साधने के लिए डोभाल और जयशंकर की सक्रियता ने भारत को ‘निर्णायक मुखिया’ की भूमिका में ला खड़ा किया है।
    • द्विपक्षीय मजबूती: भारत और यूएई के बीच ‘कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता की एक नई धुरी बन रही है।

    ओपेक के लिए बड़ा झटका

    पिछले छह दशकों से ओपेक का हिस्सा रहे यूएई का बाहर निकलना इस संगठन के लिए एक बड़ा नुकसान माना जा रहा है। सऊदी अरब के बाद यूएई इस समूह का सबसे महत्वपूर्ण सदस्य था। यूएई का मानना है कि उनकी राष्ट्रीय प्राथमिकताएं अब वैश्विक उत्पादन सीमाओं से मेल नहीं खातीं और वे अपनी अर्थव्यवस्था को विविधता देने के लिए अधिक स्वतंत्र नीति चाहते हैं।

    भारत के लिए यह घटनाक्रम एक कूटनीतिक जीत की तरह है। एक तरफ जहां दुनिया ऊर्जा संकट की आशंका से घिरी है, वहीं भारत ने अपनी सक्रिय विदेश नीति के जरिए यूएई जैसे भरोसेमंद दोस्त से भविष्य की जरूरतों के लिए ठोस आश्वासन हासिल कर लिया है। अब उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले महीनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में स्थिरता देखने को मिल सकती है।

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