अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है। 2 मई 2026 को जारी अपने नवीनतम बयान में, ट्रम्प ने स्पष्ट किया कि वे “पागलों” (ईरानी नेतृत्व की ओर इशारा करते हुए) के हाथों में परमाणु हथियार किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे।
ट्रम्प की सीधी चेतावनी
राष्ट्रपति ट्रम्प ने व्हाइट हाउस से जारी एक संदेश में कहा कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम न केवल मध्य-पूर्व, बल्कि पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए एक ‘अस्तित्वगत खतरा’ (existential threat) है। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनकी सरकार ईरान को परमाणु शक्ति बनने से रोकने के लिए सैन्य कार्रवाई सहित सभी विकल्पों पर विचार कर रही है। ट्रम्प ने पूर्व के समझौतों को ‘विनाशकारी’ बताते हुए कहा कि वे अब किसी भी ऐसी ढील की अनुमति नहीं देंगे जिससे तेहरान को अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाएं पूरी करने का मौका मिले।
यूरोप को अल्टीमेटम
ट्रम्प ने केवल ईरान को ही नहीं, बल्कि अपने यूरोपीय सहयोगियों को भी सख्त लहजे में चेतावनी दी है। उन्होंने यूरोपीय देशों पर निशाना साधते हुए कहा:
- सहयोग की कमी: ट्रम्प ने जर्मनी, इटली और स्पेन जैसे देशों की आलोचना की कि वे ईरान पर दबाव बनाने में अमेरिका का साथ नहीं दे रहे हैं।
- सैनिकों की वापसी की धमकी: उन्होंने संकेत दिया कि यदि यूरोपीय देश ईरान के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों और रणनीतियों का पूरी तरह समर्थन नहीं करते हैं, तो अमेरिका यूरोप (विशेषकर जर्मनी और इटली) से अपने सैनिकों को वापस बुलाने पर विचार कर सकता है।
- आर्थिक दबाव: ट्रम्प ने स्पष्ट किया कि जो देश ईरान के साथ व्यापार जारी रखेंगे, उन्हें अमेरिकी वित्तीय प्रणाली से बाहर कर दिया जाएगा।
मौजूदा सैन्य और कूटनीतिक स्थिति
रिपोर्ट्स के अनुसार, ओमान और पाकिस्तान की मध्यस्थता में चल रही बातचीत बेनतीजा रही है।
- ऑपरेशन मिडनाइट हैमर: पिछले वर्ष (2025) में फोर्डो और नटान्ज़ जैसे ईरानी परमाणु केंद्रों पर हुए हमलों के बाद तनाव चरम पर है।
- होर्मुज जलडमरूमध्य: ईरान ने चेतावनी दी है कि यदि दबाव कम नहीं हुआ तो वह होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बंद कर देगा, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति ठप हो सकती है।
डोनाल्ड ट्रम्प का यह बयान एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध की आहट के रूप में देखा जा रहा है। जहां एक ओर ईरान झुकने को तैयार नहीं है, वहीं ट्रम्प की “No More Mr. Nice Guy” नीति ने वैश्विक कूटनीति में खलबली मचा दी है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यूरोप अमेरिका की मांगों के आगे झुकता है या मध्य-पूर्व एक और विनाशकारी संघर्ष की ओर बढ़ता है।


