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    ‘मोदी मंदिर’ और ‘मोदी चालीसा’ का विवाद, बिहार राज्य किन्नर कल्याण बोर्ड तत्काल प्रभाव से भंग

    बिहार के समाज कल्याण विभाग ने एक बड़ा प्रशासनिक फैसला लेते हुए राज्य किन्नर (ट्रांसजेंडर) कल्याण बोर्ड को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है। सरकार की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार, बोर्ड के सभी पदेन और मनोनीत सदस्यों की सदस्यता समाप्त कर दी गई है। यह फैसला केंद्र सरकार द्वारा 30 मार्च 2026 को अधिसूचित ‘द ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) अमेंडमेंट एक्ट, 2026’ के नए प्रावधानों के आलोक में बोर्ड के पुनर्गठन के उद्देश्य से लिया गया है। हालांकि, इस प्रशासनिक फेरबदल के बीच बोर्ड के पूर्व पदाधिकारियों से जुड़ा ‘मोदी मंदिर’ और ‘मोदी चालीसा’ का विवाद भी सुर्खियों में आ गया है।

    नए केंद्रीय कानून के तहत लिया गया फैसला

    बिहार किन्नर कल्याण बोर्ड की अध्यक्ष समाज कल्याण मंत्री श्वेता गुप्ता थीं। बोर्ड का पुनर्गठन अगस्त 2025 में 3 वर्षों के कार्यकाल के लिए किया गया था। लेकिन समाज कल्याण विभाग के अनुसार, नए केंद्रीय कानून के लागू होने के बाद राज्य में रहने वाले ट्रांसजेंडर समुदाय के विभिन्न वर्गों को समान और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व देने के लिए संरचना में बदलाव जरूरी हो गया था।

    सरकार जल्द ही नए सदस्यों के मनोनयन की प्रक्रिया शुरू करेगी, जिसका प्राथमिक उद्देश्य ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के अधिकार सुनिश्चित करना होगा।

    ‘मोदी मंदिर’ और ‘मोदी चालीसा’ का विवाद

    बोर्ड को भंग किए जाने के बीच इसके पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. राजन सिंह की एक पहल विवादों के घेरे में रही।

    • मोदी मंदिर का प्रस्ताव: जुलाई 2026 में डॉ. राजन सिंह ने पटना में 5 एकड़ जमीन पर लगभग 112 करोड़ रुपये की लागत से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक मंदिर बनाने और उसमें उनकी स्वर्ण प्रतिमा स्थापित करने का प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा था।
    • मोदी चालीसा का पाठ: इसके अलावा, बोर्ड के सदस्यों द्वारा दिल्ली प्रेस क्लब में ‘मोदी चालीसा’ का पाठ भी किया गया था।

    इन घटनाक्रमों को लेकर ट्रांसजेंडर समुदाय के भीतर ही तीखा विरोध देखने को मिला। बोर्ड की पूर्व सदस्य अनुप्रिया ने स्पष्ट किया था कि मंदिर निर्माण का विचार राजन सिंह की व्यक्तिगत पहल थी और इसका बोर्ड से कोई लेना-देना नहीं था। वहीं, अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी सवाल उठाया कि कल्याण बोर्ड का मुख्य काम समुदाय के मौलिक अधिकारों, स्वास्थ्य और रोजगार के लिए संघर्ष करना है, न कि ऐसे धार्मिक व व्यक्तिगत आयोजनों में शामिल होना।

    हालांकि, राज्य सरकार ने अपने आधिकारिक आदेश में स्पष्ट किया है कि बोर्ड को भंग करने का कारण विशुद्ध रूप से कानूनी और प्रशासनिक पुनर्गठन है, जिसका इस विवाद से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है।

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