शिरोमणि अकाली दल (SAD) के अध्यक्ष और पंजाब के पूर्व उप-मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल पर महाराष्ट्र के नांदेड़ स्थित गुरुद्वारे के बाहर हुआ हालिया हमला गंभीर सुरक्षा चूक और पंजाब की राजनीति में बढ़ते कट्टरपंथी तनाव को रेखांकित करता है। दिसंबर 2024 में स्वर्ण मंदिर (अमृतसर) के बाहर हुए हमले के बाद यह दो वर्षों के भीतर उन पर दूसरा जानलेवा हमला है। सुखबीर बादल को केंद्र सरकार की ओर से ‘जेड प्लस’ (Z+) सुरक्षा प्राप्त है, फिर भी यह हमला सुरक्षा घेरे में सेंध और पंजाब के राजनीतिक-धार्मिक घटनाक्रमों से उपजे असंतोष पर बड़े सवाल खड़े करता है।
Z+ सुरक्षा के बावजूद हमला कैसे संभव हुआ?
सुखबीर सिंह बादल नांदेड़ स्थित गुरुद्वारा माता साहिब कौर के दर्शन कर लंगर हॉल की ओर बढ़ रहे थे। इसी दौरान वहां सेवादार के रूप में रह रहे एक व्यक्ति (निहंग पोशाक में) ने उन पर ‘किरपाण’ (धारदार हथियार) से हमला कर दिया।
- सार्वजनिक और धार्मिक स्थानों की संवेदनशीलता:धार्मिक स्थलों पर नेताओं की जनता और श्रद्धालुओं से नजदीकी बढ़ जाती है। सुरक्षाकर्मी अक्सर धार्मिक आस्था और श्रद्धालुओं की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए बहुत कड़ा घेरा नहीं बना पाते।
- भेष बदलकर या परिसर के अंदर से हमला:हमलावर पिछले दो वर्षों से उसी गुरुद्वारे में सेवादार के रूप में रह रहा था। अंदरूनी परिसर में तैनात व्यक्ति के अचानक हमला करने से सुरक्षाकर्मियों को प्रतिक्रिया (reaction time) देने का बेहद कम समय मिला, हालांकि सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत उसे पकड़ लिया।
- स्थानीय पुलिस और स्पेशल प्रोटेक्शन यूनिट (SPU) में समन्वय की कमी:जब Z+ सुरक्षा प्राप्त वीवीआईपी राज्य से बाहर यात्रा करते हैं, तो अग्रिम सुरक्षा संपर्क (ASL) और स्थानीय खुफिया जानकारी के बीच तालमेल में थोड़ी भी ढील बड़े खतरे का कारण बन जाती है।
2015 के बाद से कट्टरपंथियों के निशाने पर क्यों हैं सुखबीर?
सुखबीर सिंह बादल पर हमलों की जड़ें 2015 में पंजाब में हुई राजनीतिक व धार्मिक घटनाओं से जुड़ी हैं:
- 2015 का बेअदबी मामला और गोलीकांड:वर्ष 2015 में शिरोमणि अकाली दल-भाजपा शासनकाल के दौरान श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बेअदबी की घटनाएं हुई थीं। इसके विरोध में हुए प्रदर्शनों पर पुलिस फायरिंग (कोटकपूरा और बहबल कलां) में दो सिख युवाओं की मौत हो गई थी।
- अकाल तख्त द्वारा धार्मिक सजा (‘तनखाह’):2007 से 2017 के अकाली दल शासन के दौरान हुई गलतियों और निर्णयों के लिए श्री अकाल तख्त साहिब ने सुखबीर बादल और अन्य नेताओं को ‘तनखाहिया’ (धार्मिक रूप से दोषी) घोषित किया था।
- कट्टरपंथी तत्वों का उभार:अकाली दल की नरमपंथी ‘पंथिक’ राजनीति कमजोर होने से कट्टरपंथी समूहों को जगह बनाने का मौका मिला है। ये कट्टरपंथी तत्व 2015 की घटनाओं के लिए अकाली नेतृत्व को जिम्मेदार मानते हैं और लगातार उनके प्रति आक्रोश फैलाते रहे हैं।


