भारत और अमेरिका के रिश्ते इस समय एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जहां एक तरफ दोनों देशों की रणनीतिक और रक्षा साझेदारी मजबूत होती दिख रही है, तो दूसरी तरफ रूस से भारत की ऊर्जा खरीद को लेकर मतभेद बढ़ रहे हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की प्रस्तावित भारत यात्रा से पहले यह मुद्दा बातचीत के केंद्र में आ गया है। भारत ने संकेत दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता से जुड़े अपने हितों पर वह समझौता नहीं करेगा।
रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी दबाव
अमेरिका के नए प्रतिबंध कानून ने इस विवाद को और गंभीर बना दिया है। कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। हालांकि, यह शुल्क अपने आप लागू नहीं होता, बल्कि इसके लिए अमेरिकी प्रशासन को अलग से फैसला करना होगा। भारत और चीन जैसे बड़े रूसी ऊर्जा खरीदार इस प्रावधान के संभावित दायरे में हैं।
भारत के लिए चुनौती इसलिए बड़ी है क्योंकि रूस से मिलने वाला कच्चा तेल उसकी ऊर्जा आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। नई दिल्ली का तर्क रहा है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को बाजार की परिस्थितियों और उपलब्ध विकल्पों के आधार पर पूरा करता है। ऐसे में अमेरिकी दबाव के बावजूद रूस से तेल खरीद में बदलाव का फैसला केवल कूटनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि ऊर्जा कीमतों और आपूर्ति से भी जुड़ा है।
रुबियो-जयशंकर की मुलाकात में उठ चुका मुद्दा
23 सितंबर को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मार्को रूबियो से मुलाकात की थी। जयशंकर ने बताया कि उन्होंने रूस और ईरान से संबंधित अमेरिकी प्रतिबंध कानून को लेकर भारत के हितों और चिंताओं को सामने रखा। दोनों नेताओं ने खाड़ी क्षेत्र और रूस-यूक्रेन संघर्ष पर भी चर्चा की। अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, बातचीत में भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े मुद्दे भी शामिल रहे।
इस बातचीत से संकेत मिलता है कि आगामी वार्ता में ऊर्जा और प्रतिबंधों का मुद्दा प्रमुख रहेगा। अमेरिका रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए सहयोगियों और साझेदारों से उसकी ऊर्जा खरीद कम करने की अपेक्षा कर रहा है। दूसरी ओर, भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और विदेश नीति की स्वतंत्रता को ध्यान में रखते हुए फैसला लेना चाहता है।
सैन्य रिश्तों के बीच व्यापारिक तनाव
भारत-अमेरिका संबंधों में केवल ऊर्जा विवाद ही नहीं है। व्यापार और टैरिफ को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से बातचीत चल रही है। इसी दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग जारी है। हालिया सैन्य गतिविधियां इस रणनीतिक साझेदारी की निरंतरता को दर्शाती हैं।
ऐसे माहौल में रूबियो की भारत यात्रा को केवल एक नियमित राजनयिक दौरे के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। बातचीत में व्यापार, ऊर्जा, रूस पर अमेरिकी प्रतिबंध, रक्षा सहयोग और हिंद-प्रशांत जैसे मुद्दे एक साथ सामने आ सकते हैं।
समझौते से ज्यादा मोलभाव की गुंजाइश
भारत की स्थिति यह है कि ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े फैसले उसके अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों के आधार पर होंगे। वहीं अमेरिका रूस की ऊर्जा आय पर दबाव बढ़ाने के लिए अपने नए कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल कर सकता है। इसलिए आने वाली बातचीत में दोनों पक्ष अपने-अपने हितों के अनुरूप रास्ता तलाशेंगे।
रॉयटर्स के अनुसार, भारत और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ता पहले से ही संवेदनशील स्थिति में है और रूस से तेल खरीद पर अमेरिकी कानून ने इसमें एक नई जटिलता जोड़ दी है। ऐसे में आगामी कूटनीतिक बातचीत में किसी एक पक्ष के पूरी तरह पीछे हटने के बजाय शुल्क, ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक हितों के बीच संतुलन तलाशने पर जोर रहने की संभावना है।
भारत के लिए फिलहाल मुख्य संदेश यही है कि रूस से ऊर्जा खरीद और देश की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर उसकी अपनी प्राथमिकताएं हैं। अमेरिका के साथ बातचीत जारी रहेगी, लेकिन इन प्राथमिकताओं को ध्यान में रखकर ही आगे का रास्ता तय किया जाएगा।


