पवित्र नगरी काशी (वाराणसी) की गलियों से लेकर देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक पद्मश्री तक का सफर तय करने वाली प्रोफेसर मंगला कपूर (Prof. Mangala Kapoor) की कहानी अदम्य साहस, जीवटता और संगीत के प्रति अटूट समर्पण की एक अनूठी मिसाल है। वर्ष 2026 में भारत सरकार ने उन्हें ‘साहित्य और शिक्षा’ (संगीत) के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान के लिए पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा है।
जब उन्हें इस सम्मान की जानकारी मिली, तो भावुक होकर उनके मुंह से निकला, “मैंने कभी कल्पना नहीं की थी कि मुझ जैसी औरत को पद्मश्री अवॉर्ड मिलेगा। जिस समाज ने मुझे कभी इतनी उपेक्षा और पीड़ा दी, आज उसी समाज के लिए कार्य करते हुए देश का यह सर्वोच्च सम्मान मिलना मेरे लिए शब्दों से परे है।”
12 साल की उम्र में झेला तेजाबी हमला (Acid Attack)
वाराणसी के एक समृद्ध व्यापारिक परिवार में जन्मीं मंगला कपूर का बचपन बेहद खुशहाल था। लेकिन जब वह महज 12 वर्ष की थीं (सातवीं कक्षा में), तब एक व्यापारिक दुश्मनी के चलते उन पर तेजाब से जानलेवा हमला कर दिया गया। इस अमानवीय कृत्य ने उनके चेहरे और शरीर को बुरी तरह झुलसा दिया।
इसके बाद के 6 साल उन्होंने अस्पतालों के चक्कर काटने और बेहद दर्दनाक 37 सर्जिकल ऑपरेशनों से गुजरते हुए बिताए। शारीरिक दर्द के साथ-साथ उन्होंने गहरा मानसिक अवसाद (Depression) और सामाजिक अलगाव भी झेला। बचपन के साथी उनसे बात करने से डरते थे और रिश्तेदार दूरी बना चुके थे। मन में कई बार खुदकुशी के विचार भी आए, लेकिन उनके माता-पिता (विशेषकर पिता) ने उन्हें टूटने नहीं दिया और आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया।
संगीत बना जीवन का सहारा: ‘काशी की लता’ का खिताब
पिता के कहने पर मंगला ने अवसाद से बाहर निकलने के लिए संगीत की राह चुनी। ग्वालियर घराने से ताल्लुक रखने वाली मंगला ने संगीत को ही अपना भगवान और जीने का जरिया बना लिया। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से संगीत में ग्रेजुएशन, पोस्ट-जॉइंट ग्रेजुएशन (B.Mus, M.Mus में गोल्ड मेडल) और फिर पीएचडी (Ph.D.) की उपाधि हासिल की।
शुरुआती दिनों में उनके चेहरे के निशानों को देखकर आयोजक उन्हें मंच पर गाने का मौका देने से कतराते थे। एक बार तो ऑडिटोरियम में अंधेरा करके उन्हें गवाया गया, लेकिन जब उनकी सुरीली और मीठी आवाज गूंजी, तो पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। उनकी इसी जादुई आवाज के कारण वर्ष 1982 में ‘तरंग’ संस्था ने उन्हें “काशी की लता” (लता मंगेशकर) की उपाधि से सुशोभित किया।
BHU में प्रोफेसर का सफर और सामाजिक योगदान
तमाम सामाजिक रूढ़ियों और भेदभाव को दरकिनार करते हुए वर्ष 1989 में डॉ. मंगला कपूर बीएचयू (BHU) के महिला महाविद्यालय में संगीत विभाग (Vocal) में लेक्चरर के रूप में नियुक्त हुईं। करीब तीन दशकों (30 साल) तक छात्रों का भविष्य संवारने के बाद वे वर्ष 2019 में एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हुईं। उन्होंने संगीत के संरक्षण पर 5 महत्वपूर्ण किताबें भी लिखी हैं और कई दुर्लभ रागों को प्रलेखित (Document) किया है।
आज रिटायरमेंट के बाद भी वह अपने ‘प्रोफेसर मंगला कपूर फाउंडेशन’ के जरिए दिव्यांग, जरूरतमंद और गरीब बच्चों को मुफ्त संगीत की शिक्षा दे रही हैं। पूर्व में राज्यसभा द्वारा “रोल मॉडल पुरस्कार” से सम्मानित प्रो. मंगला कपूर की यह कहानी साबित करती है कि यदि हौसला बुलंद हो, तो शरीर पर लगे तेजाब के घाव भी आत्मा की चमक को फीका नहीं कर सकते।


