अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) और भारत-पाकिस्तान संबंधों पर देश का रुख बेहद स्पष्ट शब्दों में सामने रखा है। उन्होंने कहा कि 1960 में हस्ताक्षरित यह ऐतिहासिक संधि आपसी सद्भावना, सद्भाव और विश्वास की बुनियाद पर टिकी थी। हालांकि, पाकिस्तान द्वारा दशकों से जारी सीमा पार आतंकवाद और शत्रुतापूर्ण रवैये ने इस विश्वास को पूरी तरह नष्ट कर दिया है।
संधि के स्थगन का निर्णय परिस्थितियों का परिणाम
राजदूत क्वात्रा ने कहा कि सिंधु जल संधि के क्रियान्वयन को स्थगित रखने या इसकी समीक्षा करने का भारत का फैसला किसी आकस्मिक कदम का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान के लगातार गैर-जिम्मेदाराना आचरण का सीधा परिणाम है।
उन्होंने रेखांकित किया कि कोई भी अंतरराष्ट्रीय संधि या समझौता तभी सफलतापूर्वक काम कर सकता है जब दोनों देशों के बीच न्यूनतम स्तर का विश्वास बना रहे। जब एक पक्ष लगातार आतंकवाद को पनाह देकर पड़ोसी देश की सुरक्षा को खतरे में डालता है, तो संधि का मूल ढांचा ही कमजोर हो जाता है।
पाकिस्तान ने खुद गिराई अपनी साख
वॉशिंगटन में भारतीय राजदूत ने दो टूक कहा:
- साख का संकट: पाकिस्तान ने अपनी नीतियों और आतंकवाद को शह देने की आदत के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और भारत की नजरों में अपनी विश्वसनीयता खुद खोई है।
- आतंकवाद पर निर्णायक कार्रवाई जरूरी: जब तक पाकिस्तान अपनी जमीन से चलने वाले आतंकी ढांचों को पूरी तरह नष्ट नहीं करता, तब तक किसी भी द्विपक्षीय मुद्दे पर रचनात्मक बातचीत संभव नहीं है।
- भारत का स्पष्ट संदेश: ‘रक्त और पानी एक साथ नहीं बह सकते’ की नीति को दोहराते हुए भारत ने साफ कर दिया है कि आतंकवाद की छाया में जल बंटवारे या किसी अन्य रणनीतिक समझौते पर चर्चा नहीं हो सकती।
वैश्विक मंच पर पाकिस्तान बेनकाब
राजदूत विनय मोहन क्वात्रा के इस बयान से साफ है कि भारत अब पाकिस्तान की दोहरी नीति को किसी भी रूप में स्वीकार करने के मूड में नहीं है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने भी यह बात प्रमुखता से रखी है कि सिंधु जल संधि का मामला केवल जल संसाधनों के प्रबंधन का नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा से जुड़ा विषय है। पाकिस्तान को यदि भारत के साथ किसी भी मुद्दे पर वार्ता की मेज पर आना है, तो उसे सबसे पहले अपनी सरजमीं से आतंकवाद का सफाया करना होगा।


