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    तेल की कीमतों में फिर आग: ब्रेंट 97 डॉलर के पार, महंगाई का खतरा बढ़ा, जानें भारत पर क्या असर?

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेजी देखने को मिली है। अमेरिका और ईरान के बीच दोबारा शुरू हुई लड़ाई ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इसका असर गुरुवार के कारोबार में साफ दिखाई दिया, जब अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 1.7 फीसदी बढ़कर 97.25 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया। वहीं अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) भी 1.9 फीसदी चढ़कर 92.71 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया।

    अमेरिका-ईरान तनाव से बढ़ी चिंता

    तेल बाजार में इस तेजी की सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव है। अमेरिका और ईरान के बीच फिर से संघर्ष शुरू होने के बाद निवेशकों को आशंका है कि लंबे समय तक जारी रहने वाली सैन्य कार्रवाई से क्षेत्र में तेल उत्पादन और आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। ऐसे हालात में कच्चे तेल की कीमतों पर जोखिम प्रीमियम बढ़ जाता है।

    हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को कहा कि उन्हें उम्मीद है कि अमेरिका का बमबारी अभियान बहुत ज्यादा समय तक नहीं चलेगा। बाजार फिलहाल इसी संकेत और जमीनी हालात के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।

    एशियाई शेयर बाजारों में मिला-जुला रुख

    तेल की तेजी के बीच एशियाई शेयर बाजारों में कारोबार का रुख एक जैसा नहीं रहा। जापान का निक्केई 225 करीब 0.2 फीसदी नीचे रहा, जबकि दक्षिण कोरिया का कोस्पी 0.3 फीसदी चढ़ा। हांगकांग का हैंग सेंग 0.4 फीसदी गिरा, जबकि शंघाई कंपोजिट में मामूली बढ़त रही। ऑस्ट्रेलिया के एसएंडपी/एएसएक्स 200 में 0.5 फीसदी की तेजी दर्ज की गई। दूसरी ओर ताइवान का बाजार गिरा और भारत का सेंसेक्स भी करीब 0.6 फीसदी नीचे रहा।

    इससे संकेत मिलता है कि निवेशक फिलहाल तेल की बढ़ती कीमतों, भू-राजनीतिक जोखिम और अमेरिकी बाजार से मिले सकारात्मक संकेतों के बीच सावधानी बरत रहे हैं।

    वॉल स्ट्रीट की बढ़त से मिला सहारा

    इससे एक दिन पहले अमेरिकी शेयर बाजार में मजबूती रही। S&P 500 में 0.5 फीसदी, डॉव जोंस में 0.6 फीसदी और नैस्डैक कंपोजिट में 0.5 फीसदी की बढ़त दर्ज हुई। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी कंपनियों में भी खरीदारी देखने को मिली। डेल टेक्नोलॉजीज के शेयर करीब 15.8 फीसदी चढ़े, जबकि एनवीडिया में 3.2 फीसदी और मेटा प्लेटफॉर्म्स में 2.5 फीसदी की तेजी रही।

    महंगाई का खतरा क्यों बढ़ सकता है?

    कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चिंता बढ़ा सकती है। तेल महंगा होने का सीधा असर परिवहन और ऊर्जा लागत पर पड़ता है। इसके बाद माल ढुलाई, उत्पादन और रोजमर्रा की कई वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है। यही वजह है कि तेल की कीमतों में तेज उछाल से महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका रहती है।

    अमेरिकी बॉन्ड बाजार में भी ऊर्जा कीमतों और सरकारी कर्ज को लेकर चिंता दिखाई दी। अमेरिका के 10 वर्षीय ट्रेजरी पर ब्याज दर करीब 4.78 फीसदी रही। बाजार अब शुक्रवार को जारी होने वाली अमेरिकी अगस्त रोजगार रिपोर्ट पर भी नजर रखेगा, क्योंकि इससे आगे ब्याज दरों और आर्थिक नीतियों की दिशा को लेकर संकेत मिल सकते हैं।

    भारत के लिए क्यों अहम है तेल का भाव?

    भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में लंबे समय तक तेल महंगा रहने पर आयात बिल बढ़ सकता है और रुपये पर भी दबाव पड़ सकता है। हालांकि घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर असर तत्काल और सीधे तौर पर तय नहीं होता, क्योंकि इसमें अंतरराष्ट्रीय कीमतों के साथ कर, रिफाइनिंग लागत और अन्य कारक भी शामिल होते हैं।

    फिलहाल बाजार की नजर अमेरिका-ईरान संघर्ष की अवधि और पश्चिम एशिया से तेल आपूर्ति पर है। यदि तनाव जल्दी कम होता है तो कीमतों में राहत आ सकती है, लेकिन संघर्ष लंबा खिंचने पर 97 डॉलर के आसपास पहुंचा ब्रेंट क्रूड आगे भी बाजार की चिंता बढ़ा सकता है।

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