ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनावपूर्ण शांति वार्ता के बीच एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह मोजतबा खामेनेई ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि देश का समृद्ध यूरेनियम भंडार (Enriched Uranium Stockpile) ईरान से बाहर नहीं भेजा जाएगा। इस निर्णय ने अमेरिका और इजरायल की एक प्रमुख मांग को सीधे तौर पर खारिज कर दिया है, जिससे परमाणु समझौते की संभावनाएं और जटिल हो गई हैं।
प्रमुख घटनाक्रम और विवाद के बिंदु
- सर्वोच्च नेता का सख्त रुख: रॉयटर्स और अन्य मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मोजतबा खामेनेई ने सत्ता के उच्च पदस्थ अधिकारियों के साथ सहमति जताते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि यूरेनियम भंडार को देश की सीमाओं से बाहर भेजना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जोखिम भरा है।
- अमेरिका की मांग: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शांति वार्ता के दौरान यह शर्त रखी है कि किसी भी अंतिम समझौते के लिए यह अनिवार्य है कि ईरान अपने उच्च-समृद्ध यूरेनियम भंडार को पूरी तरह से देश से बाहर स्थानांतरित करे।
- इजरायल की चेतावनी: इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि जब तक ईरान से समृद्ध यूरेनियम पूरी तरह नहीं हटाया जाता, प्रॉक्सी मिलिशिया (लड़ाकू समूहों) का समर्थन बंद नहीं होता और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को समाप्त नहीं किया जाता, तब तक युद्ध समाप्त नहीं माना जाएगा।
ईरान का दृष्टिकोण: ‘रणनीतिक कमजोरी’ का डर
ईरान के शीर्ष अधिकारियों का मानना है कि यूरेनियम भंडार को विदेश भेजने का अर्थ होगा अपनी सबसे बड़ी ‘रणनीतिक ताकत’ को खो देना। ईरान को इस बात की गहरी आशंका है कि यह शांति वार्ता केवल एक ‘सामरिक धोखा’ (tactical deception) है, जिसका उपयोग वाशिंगटन और इजरायल द्वारा आगामी सैन्य हमलों की तैयारी के लिए किया जा रहा है। अधिकारियों का तर्क है कि इस सामग्री को सौंपने से ईरान भविष्य के किसी भी हमले के प्रति बेहद कमजोर हो जाएगा।
परमाणु वार्ता पर संकट
वर्तमान में, फरवरी 2026 में हुए अमेरिका-इजरायल हमलों के बाद से एक अस्थिर युद्धविराम लागू है। हालांकि, ईरान के इस कड़े फैसले ने परमाणु समझौते की राह में एक बड़ा अवरोध खड़ा कर दिया है। जहाँ पश्चिम और इजरायल ईरान के 60% तक समृद्ध यूरेनियम को परमाणु हथियार बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम मानते हैं, वहीं ईरान का कहना है कि यह केवल चिकित्सा और अनुसंधान उद्देश्यों के लिए है।
यह गतिरोध यह संकेत देता है कि ईरान भविष्य में अपनी परमाणु क्षमताओं को पूरी तरह से छोड़ने के मूड में नहीं है, जबकि अमेरिकी प्रशासन अपनी पूर्व शर्तों पर अड़ा हुआ है। अब देखना यह है कि क्या दोनों पक्ष किसी मध्य मार्ग (जैसे यूरेनियम को डाइल्यूट करना) पर सहमत हो पाएंगे या तनाव फिर से चरम पर पहुंच जाएगा।


