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    ईसुरु गांव: भारत से 5 साल पहले हुआ आजाद, अंग्रेजों को दी खुली चुनौती, बना ली ‘स्वतंत्र सरकार’

    भारत की स्वतंत्रता संग्राम की गाथा में ऐसे कई स्वर्णिम पन्ने दर्ज हैं जो आज भी देशवासियों में देशभक्ति का जज्बा भर देते हैं। ऐसा ही एक अविश्वसनीय इतिहास कर्नाटक के शिमोगा (शिवमोगा) जिले में स्थित ईसुरु (Esuru) गांव का है। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान इस गांव के निवासियों ने देश की आधिकारिक आजादी (1947) से पूरे 5 साल पहले ही खुद को ब्रिटिश हुकूमत से स्वतंत्र घोषित कर तिरंगा फहरा दिया था। कर्नाटक का ईसुरु गांव, जिसने 1942 में खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया था।

    ईसुरु भारत का पहला ऐसा गांव बना जिसने खुले तौर पर ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती देकर स्वराज की स्थापना की थी। आज भी यह गांव स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में ‘स्वतंत्र ईसुरु’ के नाम से अमर है।

    जब गांववालों ने बना ली अपनी ‘स्वतंत्र सरकार’

    सितंबर 1942 में महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के आह्वान से प्रेरित होकर ईसुरु के ग्रामीणों ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया:

    • अंग्रेजों का प्रवेश वर्जित: ग्रामीणों ने गांव के प्रवेश द्वार पर तख्तियां लगा दीं, जिस पर लिखा था — “ब्रिटिश अधिकारियों का इस गांव में प्रवेश सख्त वर्जित है।”
    • अपनी सरकार का गठन: गांव के युवाओं ने मिलकर अपनी समानांतर सरकार बना ली। उन्होंने दो कम उम्र के युवाओं — जयाप्पा को राज्यपाल और मल्लप्पा को मुख्यमंत्री नियुक्त किया।
    • कर (Tax) देने से इनकार: ग्रामीणों ने ब्रिटिश साम्राज्य को लगान या किसी भी प्रकार का कर देने से साफ इनकार कर दिया और पूरे गांव पर तिरंगा फहरा दिया।

    अंग्रेजों के खिलाफ हिंसक संघर्ष

    जब ब्रिटिश अधिकारियों को इस समानांतर सरकार की खबर मिली, तो राजस्व अधिकारी (अमल्दार) और पुलिस अधिकारी स्थिति का जायजा लेने ईसुरु पहुंचे।

    घटनाविवरण
    अफसरों पर गांधी टोपी का दबावग्रामीणों ने अंग्रेज अधिकारियों से गांधी टोपी पहनने और अपनी समानांतर सरकार का सम्मान करने को कहा।
    हिंसक झड़पअधिकारियों के इनकार और दुर्व्यवहार के बाद उग्र भीड़ और पुलिस के बीच झड़प हो गई।
    अधिकारियों की मौतइस संघर्ष में दो वरिष्ठ ब्रिटिश अधिकारी (अमल्दार और पुलिस सब-इंस्पेक्टर) मारे गए।

    ब्रिटिश हुकूमत का दमन चक्र और बलिदान

    इस घटना से बौखलाई ब्रिटिश सरकार ने ईसुरु में सेना की टुकड़ियां भेज दीं। पूरी रेजीमेंट ने गांव को घेर लिया, घरों में तोड़फोड़ की और क्रूरता से दमन चक्र चलाया।

    1. शहादत: इस मामले में मुकदमा चलाकर 5 प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों — के.ई. संप्पा, बदरप्पा, जिन्नहल्ली मल्लप्पा, सूर्यनारायणाचार और गुरुप्पा को फांसी की सजा सुनाई गई।
    2. महिलाओं का योगदान: गांव की कई महिलाओं ने भी इस आंदोलन में जेल की सजा काटी और प्रताड़ना सही।

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