फ्रांस में आयोजित 52वें जी7 (G7) शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की होने वाली द्विपक्षीय मुलाकात से ठीक पहले एक बड़ा कूटनीतिक और सैन्य घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिका के रक्षा विभाग (Pentagon) ने अपने सबसे पुराने और बड़े सैन्य कमांड ‘यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड’ (USINDOPACOM) का नाम बदलकर फिर से ‘यूएस पैसिफिक कमांड’ (USPACOM) कर दिया है। नाम से ‘इंडो’ (भारत) शब्द को हटाए जाने के इस फैसले को मीडिया और राजनीतिक गलियारों में भारत के लिए एक प्रतीकात्मक झटके के रूप में देखा जा रहा है।
नाम बदलने के पीछे अमेरिका का तर्क
अमेरिकी रक्षा विभाग (Department of War) ने मंगलवार को एक आधिकारिक बयान जारी कर इस फैसले की घोषणा की। 2018 में डोनाल्ड ट्रंप के पिछले कार्यकाल के दौरान ही इस कमांड का नाम बदलकर ‘इंडो-पैसिफिक कमांड’ किया गया था, ताकि हिंद महासागर में भारत की बढ़ती रणनीतिक भूमिका को रेखांकित किया जा सके। अब इसे दोबारा बदलने के पीछे अमेरिका ने निम्नलिखित कारण बताए हैं:
- ऐतिहासिक विरासत (Legacy): पेंटागन के अनुसार, इस कमांड की स्थापना 1 जनवरी 1947 को तत्कालीन राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने की थी। 70 से अधिक वर्षों तक इसका नाम ‘यूएस पैसिफिक कमांड’ ही रहा था। इस पुराने नाम को बहाल करना इसकी ऐतिहासिक सैन्य विरासत को सम्मान देना है।
- ‘यथार्थवाद’ की ओर वापसी: हाल ही में सिंगापुर में हुए शांग्री-ला डायलॉग में अमेरिकी रक्षा सचिव ने “पैसिफिक में यथार्थवाद (Realism) की ओर वापसी” का संकेत दिया था, जिसे चीन के खिलाफ अमेरिकी रणनीतियों में आए बदलाव से जोड़कर देखा जा रहा है।
क्या वाकई चीन के खिलाफ ‘दीवार’ टूटी?
भले ही नाम से ‘भारत’ (Indo) शब्द हट गया हो, लेकिन अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि इससे जमीनी स्तर पर कोई बड़ा रणनीतिक बदलाव नहीं होने जा रहा है।
| विषय | वर्तमान स्थिति और हकीकत |
| कमांड का दायरा (AOR) | इस कमांड का परिचालन क्षेत्र पहले की तरह ही अमेरिकी पश्चिमी तट से लेकर भारत की पश्चिमी सीमा (Western Border) तक फैला रहेगा। |
| सैनिक और मिशन | सैनिकों की संख्या (लगभग 3,75,000 नागरिक और सैन्य कर्मी), सैन्य मिशन और पेंटागन की परिचालन संरचना में कोई बदलाव नहीं किया गया है। |
| रणनीतिक लक्ष्य | अमेरिका ने कहा है कि क्षेत्र को “स्वतंत्र और खुला” (Free and Open Indo-Pacific) बनाए रखने के लिए क्षेत्रीय सहयोगियों (जैसे भारत) के साथ उसकी प्रतिबद्धता अपरिवर्तित है। |
भारत में तीखी प्रतिक्रिया और टाइमिंग पर सवाल
इस फैसले की टाइमिंग को लेकर भारतीय रणनीतिक विशेषज्ञों और पूर्व सैन्य अधिकारियों ने गंभीर सवाल उठाए हैं। पीएम मोदी और डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात से ठीक पहले लिया गया यह फैसला दोनों देशों के बीच हालिया व्यापारिक गतिरोध और ‘भरोसे की कमी’ (Shortage of Trust) के बीच आया है। इसके अलावा, हाल ही में यूएस पैसिफिक कमांड की वेबसाइट पर भारत का एक विवादित नक्शा (जिसमें जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों को अलग दिखाया गया) प्रकाशित होने से भी विवाद खड़ा हो गया है।
पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल अरुण प्रकाश (रिटायर्ड) का बयान: “यह कदम दर्शाता है कि वाशिंगटन की नीतियां कितनी अविश्वसनीय और कम सोची-समझी होती हैं। 2018 में इसे एक ऐतिहासिक कदम बताया गया था, और आज अपने हित बदलते ही उन्होंने इसे दोबारा बदल दिया।”
भले ही अमेरिका इसे प्रशासनिक और ऐतिहासिक बदलाव बता रहा हो, लेकिन रणनीतिक जानकारों का मानना है कि इस फैसले से भारत और क्वाड (Quad) देशों के बीच के कूटनीतिक संतुलन पर बातचीत करने के लिए पीएम मोदी को ट्रंप के सामने इस मुद्दे को मजबूती से उठाना पड़ सकता है।


