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    GDP ग्रोथ और वैश्विक रैंकिंग अलग-अलग? विरोधाभास चर्चा का विषय, समझिए पूरा गणित

    भारत की अर्थव्यवस्था ने अप्रैल-जून 2026 की तिमाही में 7.8 फीसदी की मजबूत GDP ग्रोथ दर्ज की है। यह आंकड़ा उम्मीद से बेहतर रहा और भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बना हुआ है। इसके बावजूद वैश्विक GDP रैंकिंग में भारत पांचवें स्थान से फिसलकर छठे स्थान पर आ गया है। यही विरोधाभास इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है।

    चीन के सरकारी समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स ने भी इसी सवाल पर रिपोर्ट प्रकाशित करते हुए समझाया है कि GDP ग्रोथ और वैश्विक रैंकिंग दो अलग-अलग चीजें हैं। भारत की रैंकिंग में गिरावट का मतलब यह नहीं है कि उसकी अर्थव्यवस्था सिकुड़ गई है।

    रुपये की कमजोरी सबसे बड़ी वजह

    भारत की वैश्विक GDP रैंकिंग आम तौर पर नॉमिनल GDP को अमेरिकी डॉलर में बदलकर तय की जाती है। यानी भारत में रुपये के लिहाज से अर्थव्यवस्था बढ़ रही हो, लेकिन अगर इसी दौरान रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो जाए तो डॉलर में भारत की GDP का आकार अपेक्षाकृत कम दिखाई दे सकता है।

    2025-26 में भारत की नॉमिनल GDP करीब 3.92 ट्रिलियन डॉलर आंकी गई थी। इसी आधार पर भारत छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना।

    बिजनेस स्टैंडर्ड के विश्लेषण के मुताबिक, भारत की घरेलू GDP रुपये में बढ़ी, लेकिन रुपये में कमजोरी ने डॉलर में उसकी आर्थिक क्षमता के मूल्य को प्रभावित किया। इसी वजह से भारत ब्रिटेन और जापान से पीछे चला गया।

    दूसरे देशों की रफ्तार भी मायने रखती है

    वैश्विक रैंकिंग सिर्फ भारत की ग्रोथ से तय नहीं होती। अमेरिका, चीन, जापान, ब्रिटेन और जर्मनी जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की GDP, उनकी मुद्राओं की चाल और कीमतों में बदलाव भी रैंकिंग को प्रभावित करते हैं।

    इसलिए भारत 7.8 फीसदी की तेज रफ्तार से बढ़ते हुए भी रैंकिंग में नीचे जा सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह मुख्य रूप से डॉलर कन्वर्जन और तुलनात्मक बदलाव का मामला है, न कि भारतीय अर्थव्यवस्था के कमजोर पड़ने का।

    7.8% ग्रोथ क्यों अहम है?

    अप्रैल-जून 2026 में भारत की वास्तविक GDP 7.8 फीसदी बढ़ी। यह RBI के करीब 7 फीसदी के अनुमान और अर्थशास्त्रियों के लगभग 7.1 फीसदी के अनुमान से बेहतर रही। इससे पता चलता है कि घरेलू मांग, निवेश और आर्थिक गतिविधियों में मजबूती बनी हुई है।

    हालांकि, पिछली तिमाही में GDP ग्रोथ 8.6 फीसदी रही थी। यानी तिमाही आधार पर वृद्धि की रफ्तार कुछ कम हुई है, लेकिन 7.8 फीसदी का आंकड़ा फिर भी काफी मजबूत है।

    नई GDP सीरीज का भी असर

    भारत ने GDP की गणना के लिए नई सीरीज अपनाई है, जिसमें 2022-23 को बेस ईयर बनाया गया है। इसमें डेटा स्रोतों और कीमतों को मापने के तरीके में भी बदलाव किया गया है। सरकार का कहना है कि इससे अर्थव्यवस्था की वास्तविक तस्वीर बेहतर तरीके से सामने आती है।

    हालांकि, 7.8 फीसदी के आंकड़े पर कुछ अर्थशास्त्रियों ने सवाल भी उठाए हैं। उनका तर्क है कि नए तरीके, GDP डिफ्लेटर और बेस इफेक्ट जैसे आंकड़ों को समझना जरूरी है। दूसरी ओर सरकार और सांख्यिकी अधिकारियों ने डेटा का बचाव करते हुए इसे नई और बेहतर पद्धति का परिणाम बताया है।

    छठे नंबर का मतलब क्या?

    भारत का छठे स्थान पर आना यह नहीं बताता कि देश की अर्थव्यवस्था कमजोर हो गई है। रैंकिंग डॉलर में आकार बताती है, जबकि 7.8 फीसदी ग्रोथ अर्थव्यवस्था की वास्तविक वृद्धि की दर बताती है। दोनों को एक ही पैमाने से देखना सही नहीं होगा।

    ग्लोबल टाइम्स ने भी इसी अंतर को रेखांकित किया है। भारत की दीर्घकालिक आर्थिक संभावनाएं मजबूत बनी हुई हैं। अगर रुपया स्थिर रहता है, घरेलू निवेश और खपत मजबूत रहती है तथा उच्च आर्थिक वृद्धि जारी रहती है, तो भारत आने वाले वर्षों में फिर से ऊंची वैश्विक रैंकिंग हासिल कर सकता है।

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