मध्य-पूर्व (West Asia) में जारी संघर्ष ने एक नया और खतरनाक मोड़ ले लिया है। ईरान अब समुद्र में पारंपरिक युद्ध के बजाय गुरिल्ला युद्ध (Asymmetric Warfare) की रणनीति अपना रहा है, जो अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है।
ड्रोन और ‘सुसाइड बोट्स’ से समुद्री युद्ध
- कम लागत, बड़ा नुकसान: ईरान ‘कामिकेजी’ (Kamikaze) ड्रोन और अनक्रूड सरफेस वेसल्स (USVs) यानी रिमोट से चलने वाली ‘सुसाइड बोट्स’ का उपयोग कर रहा है। एक ड्रोन की लागत महज $30,000 से $50,000 के बीच है, जबकि इसे गिराने के लिए अमेरिका को लाखों डॉलर की इंटरसेप्टर मिसाइलों (जैसे पैट्रियट) का इस्तेमाल करना पड़ता है। यह रणनीति अमेरिका को आर्थिक रूप से कमजोर करने की चाल है।
- समुद्री व्यापार पर खतरा: मार्च की शुरुआत में ओमान तट पर ‘MKD VYOM’ तेल टैंकर पर ‘कामिकेजी ड्रोन बोट’ से हुआ हमला इसका पहला बड़ा उदाहरण है। इससे पता चलता है कि ईरान अब होर्मुज जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाकर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को बाधित कर रहा है।
- अमेरिकी नौसेना की चुनौती: अमेरिकी सैन्य अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि ईरान के सैकड़ों की संख्या में आ रहे ड्रोन्स को हर बार मार गिराना संभव नहीं है। भले ही अमेरिका ने अब तक ईरान के कई जंगी जहाज और ‘ड्रोन कैरियर’ नष्ट कर दिए हैं, लेकिन ईरान की यह ‘स्वाम ड्रोन’ (Swarms of Drones) रणनीति रडार को चकमा देने और एयर डिफेंस सिस्टम को थकाने में काफी हद तक सफल रही है।
युद्ध का बदलता गणित
- आर्थिक मार: युद्ध के शुरुआती घंटों में ही अमेरिका को अरबों डॉलर का खर्च उठाना पड़ा है। पेंटागन के अनुसार, ईरानी ड्रोन्स का मुकाबला करने की लागत युद्ध को और अधिक महंगा बना रही है।
- नई तकनीक: रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूस की मदद से ईरान अपनी ड्रोन रणनीति को और अधिक ‘एडवांस’ बना रहा है। ईरान अब अमेरिकी और इजरायली राडार प्रणालियों को निशाना बना रहा है ताकि उनकी रक्षा पंक्ति में सेंध लगाई जा सके।
- अमेरिका की जवाबी रणनीति: इन हमलों का जवाब देने के लिए अमेरिका ने अपनी रणनीति बदलते हुए सीधे ड्रोन लॉन्च साइटों और मिसाइल ठिकानों को नष्ट करने पर ध्यान केंद्रित किया है। अमेरिका ने ईरान की नौसैनिक क्षमता को भारी नुकसान पहुँचाया है, लेकिन समुद्र में छोटे ड्रोन्स का खतरा अभी भी बरकरार है।
कुल मिलाकर, यह संघर्ष केवल मिसाइलों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह एक ऐसी तकनीकी जंग बन गया है जहाँ सस्ते ड्रोन महंगे रक्षा सिस्टम पर भारी पड़ रहे हैं।


