नेपाल में जय प्रलय के बाद हिमालयी क्षेत्र में तेजी से बदल रहे पर्यावरण और पिघलते ग्लेशियरों ने एक नई चिंता खड़ी कर दी है। हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद के ताजा अध्ययन में सामने आया है कि ट्रांस हिमालय से जुड़े सतलुज बेसिन में 2,292 ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं। इनमें से कई झीलों के आकार में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। वैज्ञानिकों को आशंका है कि किसी बड़ी झील का प्राकृतिक बांध टूटने की स्थिति में हिमाचल प्रदेश ही नहीं, बल्कि पंजाब और जम्मू-कश्मीर तक विनाशकारी बाढ़ पहुंच सकती है।
अध्ययन के मुताबिक, सतलुज बेसिन की 2,292 ग्लेशियल झीलों में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि 1,335 झीलें चीन के नियंत्रण वाले तिब्बती क्षेत्र में स्थित हैं। भारत के प्रत्यक्ष नियंत्रण से बाहर होने के कारण इन झीलों की नियमित और जमीनी स्तर पर निगरानी संभव नहीं है। ऐसे में सीमा पार से आने वाली किसी संभावित ग्लेशियल झील विस्फोटजनित बाढ़ यानी GLOF की आशंका चिंता बढ़ाती है।
हिमाचल में भी सैकड़ों झीलें, कई का आकार बड़ा
रिपोर्ट में बताया गया है कि 470 ग्लेशियल झीलें स्पीति क्षेत्र में हैं, जबकि 487 झीलें किन्नौर के खाब से नीचे हिमाचल में प्रवेश करने वाले सतलुज क्षेत्र से जुड़ी हैं। इनमें 49 झीलें ऐसी हैं, जिनका क्षेत्रफल 10 हेक्टेयर से अधिक है। 51 झीलें पांच से 10 हेक्टेयर के बीच फैली हैं। बड़ी संख्या में छोटी झीलें भी मौजूद हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण इनके आकार और जलस्तर में बदलाव की संभावना बनी हुई है।
खतरा केवल सतलुज तक सीमित नहीं है। चिनाब और रावी नदी बेसिन के ग्लेशियर क्षेत्रों में भी 373 झीलों की पहचान की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी नदियों से जुड़े ऊंचाई वाले इलाकों में किसी भी बड़ी झील के टूटने का असर कई राज्यों और नदी घाटियों तक पहुंच सकता है।
गीपनगाथ झील बनी सबसे बड़ी चिंता
लाहौल-स्पीति के सिस्सू क्षेत्र के पास स्थित गीपनगाथ झील का तेजी से बढ़ता आकार वैज्ञानिकों के लिए विशेष चिंता का विषय बन गया है। आंकड़ों के अनुसार, 1975 में यह झील करीब 27 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली थी, लेकिन अब इसका विस्तार बढ़कर लगभग 110 हेक्टेयर तक पहुंच गया है। यानी कुछ दशकों में इसका क्षेत्रफल चार गुना से अधिक बढ़ गया।
झील की औसत गहराई लगभग 36 मीटर बताई गई है। क्षेत्रफल के लिहाज से यह हिमाचल प्रदेश की सबसे बड़ी झील बन चुकी है। विशेषज्ञों के अनुसार, ग्लेशियरों के लगातार पिघलने से झील में पानी की मात्रा बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि इसके आसपास के प्राकृतिक बांध की स्थिरता और संभावित खतरे पर गंभीर निगरानी की जरूरत महसूस की जा रही है।
भूस्खलन, हिमस्खलन या भूकंप से बढ़ सकता है संकट
हिमालयी झीलों का सबसे बड़ा खतरा उनका प्राकृतिक बांध है। यदि भारी भूस्खलन, हिमस्खलन, तेज बारिश या भूकंप जैसी किसी घटना से झील के किनारे बना प्राकृतिक अवरोध कमजोर पड़ता है, तो अचानक भारी मात्रा में पानी और मलबा नीचे की ओर बह सकता है।
गीपनगाथ जैसी बड़ी झील के टूटने की स्थिति में बाढ़ का तेज प्रवाह उदयपुर क्षेत्र से होते हुए आगे चिनाब नदी तंत्र को प्रभावित कर सकता है। इसका असर हिमाचल से आगे जम्मू-कश्मीर तक पहुंचने की आशंका जताई गई है। इसी तरह सतलुज बेसिन में ऊपरी इलाकों से आने वाली बाढ़ हिमाचल के बाद पंजाब के मैदानी क्षेत्रों के लिए भी चुनौती बन सकती है।
नेपाल जैसी त्रासदी से सबक लेने की जरूरत
हिमालयी क्षेत्र में हाल के वर्षों में अचानक बाढ़, ग्लेशियर टूटने और भूस्खलन की घटनाओं ने चेतावनी दी है कि केवल पारंपरिक मौसम पूर्वानुमान पर्याप्त नहीं हैं। ग्लेशियल झीलों की लगातार सैटेलाइट और जमीनी निगरानी, रियल-टाइम जलस्तर मापन और मजबूत अर्ली वार्निंग सिस्टम की जरूरत बढ़ती जा रही है।
विशेषकर सीमा पार स्थित झीलों के मामले में डेटा साझा करने और वैज्ञानिक सहयोग को मजबूत करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। किसी भी आपदा के बाद राहत अभियान शुरू करने से अधिक जरूरी है कि खतरे के शुरुआती संकेत मिलते ही निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को समय पर चेतावनी दी जा सके।
कुल मिलाकर, 2,292 ग्लेशियल झीलों का यह अध्ययन हिमालयी पारिस्थितिकी के सामने बढ़ते खतरे की गंभीर तस्वीर पेश करता है। पिघलते ग्लेशियरों और बढ़ती झीलों के बीच अब चुनौती सिर्फ पर्यावरण संरक्षण की नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की सुरक्षा और समय रहते आपदा से बचाव की भी है।


