कर्नाटक के बंटवाल नगर में एक सफाईकर्मी इन दिनों अपनी अनोखी जीवन यात्रा को लेकर चर्चा में है। 45 वर्षीय सेसप्पा रोज सुबह टोयोटा फॉर्च्यूनर से ड्यूटी पर पहुंचते हैं, सड़क और सरकारी दफ्तरों के आसपास सफाई करते हैं और काम पूरा होने के बाद उसी गाड़ी से लौट जाते हैं। उन्हें देखकर कई लोग हैरान हो जाते हैं, क्योंकि आमतौर पर सफाईकर्मी और महंगी एसयूवी का ऐसा संयोजन देखने को नहीं मिलता। लेकिन सेसप्पा की कहानी केवल एक फॉर्च्यूनर की नहीं, बल्कि संघर्ष, मेहनत और जिंदगी बदल देने वाले फैसलों की कहानी है।
सेसप्पा की शुरुआत बेहद साधारण और कठिन परिस्थितियों से हुई थी। वर्ष 1996 में उन्होंने बंटवाल टाउन म्युनिसिपल काउंसिल में महज 50 रुपये प्रतिदिन की दिहाड़ी पर सफाईकर्मी के रूप में काम शुरू किया। कुछ वर्षों बाद उन्हें स्थायी कर्मचारी बना दिया गया, लेकिन आर्थिक चुनौतियां खत्म नहीं हुईं। परिवार चलाने के लिए उन्हें नगर निकाय की नौकरी के अलावा खेती-बाड़ी, डेयरी और दूसरे मजदूरी के काम भी करने पड़े।
कार खरीदना था बड़ा सपना
नावूर के रहने वाले सेसप्पा का सपना था कि एक दिन उनके पास अपनी कार हो। उन्होंने इस सपने को केवल इच्छा बनाकर नहीं छोड़ा, बल्कि अतिरिक्त मेहनत के जरिए धीरे-धीरे अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत की। सेसप्पा और उनके बेटे दोनों को गाड़ियों का शौक है। उन्होंने पहले मारुति 800 खरीदी, फिर उसे बेचकर ऑल्टो ली। इसके बाद स्कॉर्पियो जैसी गाड़ियां भी उनके पास रहीं। हर बार पुरानी गाड़ी बेचकर अगली गाड़ी खरीदते गए और आखिरकार उन्होंने एक पुरानी टोयोटा फॉर्च्यूनर खरीद ली।
लेकिन उनकी जिंदगी का सफर बिल्कुल आसान नहीं था। सेसप्पा के अनुसार, एक समय ऐसा भी था जब घर में खाने तक का इंतजाम मुश्किल हो जाता था। आर्थिक परेशानियों के बीच उन्हें शराब की लत लग गई थी। सबसे कठिन दौर तब आया जब उनके पिता का निधन हुआ और अंतिम संस्कार के लिए भी पर्याप्त पैसे नहीं थे। मदद न मिलने पर उन्हें अपने पिता के शव को नेत्रवती नदी के किनारे ले जाकर स्वयं अंतिम संस्कार करना पड़ा।
एक बातचीत ने बदल दी जिंदगी
सेसप्पा के जीवन में बड़ा बदलाव तब आया जब बंटवाल पुलिस स्टेशन में तैनात रहे एक सब-इंस्पेक्टर बेलियप्पा से उनकी बातचीत हुई। इसके बाद उन्होंने शराब छोड़ने और अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने का फैसला किया। उन्होंने मेहनत को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया और नियमित नौकरी के साथ अतिरिक्त काम जारी रखा। आज वह अपनी पत्नी, दो बेटियों और बेटे के साथ परिवार की जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं।
सेसप्पा की दिनचर्या आज भी मेहनत से भरी है। वह सुबह करीब 5:30 से 6 बजे के बीच काम पर पहुंचते हैं और बीसी रोड तथा सरकारी कार्यालयों के आसपास सफाई करते हैं। उन्होंने कचरा उठाने वाली गाड़ी चलाने की जिम्मेदारी भी संभाली है। इसके बाद भी उनका काम खत्म नहीं होता; दोपहर के समय वे खेती, डेयरी और अन्य कामों में जुट जाते हैं।
अधिकारी ने भी की तारीफ
बंटवाल म्युनिसिपल के चीफ ऑफिसर तीर्थप्रसाद ने सेसप्पा को शांत, ईमानदार और मेहनती कर्मचारी बताया। उनके अनुसार, सेसप्पा को जो जिम्मेदारी दी जाती है, वह उसे पूरी निष्ठा से निभाते हैं और अब तक उनके कामकाज पर कोई सवाल नहीं उठा है।
सेसप्पा की कहानी इस बात की मिसाल है कि किसी व्यक्ति की पहचान उसके पेशे या वाहन से नहीं, बल्कि उसके संघर्ष और मेहनत से होती है। 50 रुपये की दिहाड़ी से शुरुआत कर फॉर्च्यूनर तक पहुंचने के बाद भी उन्होंने अपनी सफाईकर्मी की नौकरी नहीं छोड़ी। यही उनकी कहानी को खास बनाता है।


