भारत इस साल 17 साल के सबसे कमजोर मानसून की ओर बढ़ रहा है। 18 सितंबर तक देश में जून से सितंबर के मानसून सीजन में सामान्य से करीब 15 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है। अगर सीजन के अंत तक यही स्थिति बनी रहती है, तो 2026 का मानसून 2009 के बाद सबसे कमजोर साबित हो सकता है। 2009 में बारिश सामान्य से 18 फीसदी कम रही थी।
सितंबर में भी बारिश का संकट
मानसून के अंतिम दौर में भी बारिश की कमी दूर नहीं हुई है। सितंबर में देश के कुछ हिस्सों में सामान्य से 50 फीसदी तक कम बारिश हुई है। भारत की कुल सालाना बारिश का करीब 70 फीसदी हिस्सा दक्षिण-पश्चिम मानसून से मिलता है, इसलिए लंबे समय तक बारिश की कमी का सीधा असर खेती, जलाशयों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
आईएमडी ने अप्रैल में ही 2026 के मानसून को सामान्य से कम रहने का अनुमान जताया था। विभाग ने पूरे सीजन के लिए बारिश को दीर्घकालिक औसत (LPA) का 92 फीसदी रहने का अनुमान लगाया था। आईएमडी ने यह भी कहा था कि मानसून के दौरान अल नीनो की स्थिति विकसित हो सकती है।
218 जिलों में सूखे जैसे हालात
कम बारिश का असर देश के कई हिस्सों में दिखाई दे रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 802 में से 218 जिलों में सूखे जैसी स्थिति बताई गई है। मेघालय में बारिश की कमी 59 फीसदी, आंध्र प्रदेश में 42 फीसदी, पंजाब में 39 फीसदी, बिहार में 36 फीसदी और कर्नाटक में 30 फीसदी तक रही। राजस्थान, हरियाणा, तेलंगाना, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी बारिश सामान्य से कम दर्ज हुई।
हालांकि पूरे देश में स्थिति एक जैसी नहीं है। दिल्ली में इस मानसून सामान्य से करीब 8 फीसदी ज्यादा बारिश हुई, जबकि उत्तराखंड में भी बारिश सामान्य से ऊपर रही। इससे साफ है कि इस साल मानसून का वितरण काफी असमान रहा है।
धान, दलहन, कपास और मक्का पर असर
बारिश की कमी का सबसे बड़ा असर खरीफ फसलों पर पड़ रहा है। धान, दलहन, कपास और मक्का जैसी फसलों को कम पानी से नुकसान की आशंका है। खासकर धान उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ी है। रॉयटर्स के अनुसार 2026 में भारत का चावल उत्पादन करीब 10 मिलियन टन घटने का अनुमान है, जो लगभग दो दशक में सबसे बड़ी गिरावट हो सकती है।
कम उत्पादन से स्थानीय बाजार में खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि भारत के पास पर्याप्त चावल का भंडार मौजूद है, इसलिए तत्काल खाद्यान्न संकट की स्थिति नहीं मानी जा रही है।
178 बड़े जलाशयों में भी पानी कम
कमजोर मानसून का असर जल भंडारण पर भी पड़ा है। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के मुताबिक देश के 178 प्रमुख जलाशयों में उनकी कुल क्षमता का करीब 70.66 फीसदी पानी ही उपलब्ध है। इससे सिंचाई के साथ-साथ आने वाले महीनों में पेयजल और रबी फसलों के लिए भी चुनौती बढ़ सकती है।
एशिया पर सुपर अल नीनो का खतरा
मौसम विशेषज्ञों की चिंता अब केवल मौजूदा मानसून तक सीमित नहीं है। प्रशांत महासागर के असामान्य रूप से गर्म होने से बहुत मजबूत या ‘सुपरसाइज्ड’ अल नीनो की आशंका जताई जा रही है। आईएमडी के अनुसार अल नीनो सामान्य तौर पर भारतीय मानसून को कमजोर करता है और इसका प्रभाव खासकर मानसून के दूसरे हिस्से में अधिक स्पष्ट हो सकता है।
एशिया के कई देशों में पहले से ही सूखा, अत्यधिक गर्मी और कृषि उत्पादन में गिरावट की आशंका है। विशेषज्ञों के मुताबिक यदि अल नीनो 2026 के अंत और 2027 की शुरुआत में बहुत मजबूत होता है, तो भारत समेत एशिया के कई हिस्सों में पानी, कृषि और खाद्य कीमतों से जुड़ी चुनौतियां और बढ़ सकती हैं।


