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    पाकिस्तान में हर माह 120 सुरक्षाकर्मियों की मौत, बलूचिस्तान की बगावत बनी नासूर

    पाकिस्तान में बलूचिस्तान की बढ़ती हिंसा ने सेना प्रमुख और अब चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। अलगाववादी संगठन बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) और दूसरे सशस्त्र समूह लगातार सुरक्षा प्रतिष्ठानों, सैन्य काफिलों और सरकारी ढांचे को निशाना बना रहे हैं। हाल के महीनों में हिंसा की तीव्रता ने इस सवाल को भी जन्म दिया है कि क्या पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाई लंबे समय से चले आ रहे बलूच विद्रोह को दबाने में सफल हो पा रही है।

    बलूचिस्तान में क्यों बढ़ी परेशानी?

    बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, लेकिन आबादी के लिहाज से यह देश के अन्य हिस्सों से काफी कम घना है। लंबे समय से यहां संसाधनों पर अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, कथित मानवाधिकार उल्लंघन और केंद्र सरकार की नीतियों को लेकर असंतोष रहा है। इन्हीं शिकायतों के बीच अलगाववादी संगठनों ने सशस्त्र आंदोलन को बढ़ाया है।

    2026 में भी यहां हिंसा का सिलसिला जारी है। जुलाई में बलूचिस्तान में बड़े हमलों के बाद पाकिस्तानी अधिकारियों ने जवाबी अभियानों में दर्जनों संदिग्ध विद्रोहियों को मारने का दावा किया था। जुलाई के एक हिंसक दौर में 42 लोगों की मौत के बाद प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को भी क्वेटा जाकर हालात की समीक्षा करनी पड़ी थी।

    सुरक्षाबलों को लगातार नुकसान

    बलूच विद्रोह की सबसे बड़ी चिंता पाकिस्तान के लिए यह है कि हमलों में सुरक्षा बल सीधे निशाने पर हैं। South Asia Terrorism Portal के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में बलूचिस्तान में 751 सुरक्षा बलों के जवानों की मौत दर्ज की गई थी। यह 2000 के बाद उसके रिकॉर्ड में सुरक्षा बलों के लिए सबसे घातक वर्षों में से एक रहा। 2026 की शुरुआत में भी हिंसा का सिलसिला जारी रहा और जनवरी के पहले 25 दिनों में ही 71 सुरक्षा बल कर्मियों की मौत दर्ज की गई।

    हालांकि, हर महीने 120 सुरक्षाकर्मियों की मौत का आंकड़ा सभी उपलब्ध स्रोतों से स्वतंत्र रूप से पुष्ट नहीं होता। इसलिए इसे एक रिपोर्ट या दावे के तौर पर देखना जरूरी है, न कि पूरे पाकिस्तान के लिए स्थापित मासिक औसत के रूप में।

    BLA के हमलों ने बढ़ाई चुनौती

    सितंबर की शुरुआत में BLA ने बलूचिस्तान में दो हमलों की जिम्मेदारी लेते हुए 25 पाकिस्तानी सैन्यकर्मियों को मारने का दावा किया। संगठन ने सैन्य वाहनों को भी निशाना बनाने की बात कही। पाकिस्तान की ओर से इन दावों की पूरी स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है।

    इसी दौरान पाकिस्तानी सेना ने बलूचिस्तान के मस्तुंग, सिबी, क्वेटा और कलात में अभियानों के दौरान 48 आतंकियों को मारने का दावा किया। सेना ने मारे गए लोगों को BLA और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) से जुड़े होने की बात कही। ऐसे अभियानों से साफ है कि पाकिस्तान सैन्य दबाव बढ़ा रहा है, लेकिन दूसरी तरफ विद्रोही संगठन भी जवाबी हमलों की क्षमता बनाए हुए हैं।

    आसिम मुनीर के लिए दोहरी चुनौती

    आसिम मुनीर की स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हालिया सैन्य सुधारों के बाद उन्हें पाकिस्तान के चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज की अतिरिक्त जिम्मेदारी मिली है। नए ढांचे के तहत उन्हें सेना, नौसेना और वायुसेना के संचालन पर व्यापक अधिकार प्राप्त हुए हैं। ऐसे में देश की आंतरिक सुरक्षा की बड़ी चुनौती सीधे उनके सैन्य नेतृत्व की परीक्षा बनती है।

    मुनीर लगातार बलूचिस्तान में आतंकवादी ढांचे को खत्म करने की बात कहते रहे हैं। जुलाई में उन्होंने सुरक्षा बलों के अभियानों को जारी रखने और आतंकवादी ढांचे को नष्ट करने का संकल्प दोहराया था।

    सिर्फ सैन्य कार्रवाई से नहीं निकलेगा रास्ता

    विशेषज्ञों के मुताबिक बलूचिस्तान की समस्या केवल सुरक्षा अभियान से हल होना मुश्किल है। अगस्त के अंत में Pakistan Institute for Conflict and Security Studies की रिपोर्ट में भी सुरक्षा कार्रवाई के साथ राजनीतिक संवाद, विकास और स्थानीय लोगों को संसाधनों का लाभ पहुंचाने की जरूरत पर जोर दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार हालिया अवधि में बलूचिस्तान में पाकिस्तान के अन्य क्षेत्रों की तुलना में हिंसा का दबाव खास तौर पर ज्यादा रहा।

    यही आसिम मुनीर की सबसे बड़ी चुनौती है। सेना के पास व्यापक ताकत और संसाधन हैं, लेकिन अगर स्थानीय असंतोष लगातार बना रहता है तो केवल ऑपरेशन के जरिए विद्रोह को स्थायी रूप से खत्म करना मुश्किल हो सकता है।

    बलूचिस्तान की बगावत अब पाकिस्तान के लिए सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं रह गई है। यह सेना की क्षमता, सरकार की राजनीतिक रणनीति और देश की आंतरिक स्थिरता—तीनों की परीक्षा बन चुकी है।

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