More
    HomeHindi NewsDelhi NewsISI का नया जासूसी पैटर्न, सोलर कैमरों से सेना पर नजर, चीनी...

    ISI का नया जासूसी पैटर्न, सोलर कैमरों से सेना पर नजर, चीनी क्लाउड सिस्टम का लिया सहारा

    ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने भारत में जासूसी के तौर-तरीकों में बदलाव किया है। अब संवेदनशील सैन्य इलाकों की निगरानी के लिए पारंपरिक तरीकों के साथ-साथ सोलर पावर से चलने वाले सीसीटीवी कैमरों का इस्तेमाल किए जाने का मामला सामने आया है। सैन्य ठिकानों और सेना की आवाजाही वाले इलाकों के आसपास लगाए गए ऐसे कैमरों की लाइव फीड पाकिस्तान में बैठे हैंडलर्स तक पहुंचाए जाने का आरोप है।

    सोलर कैमरों के जरिए निगरानी का आरोप

    जांच एजेंसियों के सामने आए मामलों में बताया गया है कि जासूसी नेटवर्क से जुड़े लोगों ने ऐसे सीसीटीवी कैमरों का इस्तेमाल किया, जिन्हें बिजली के पारंपरिक कनेक्शन की जरूरत नहीं होती। कैमरे सोलर पैनल से संचालित किए जा सकते हैं और इंटरनेट कनेक्टिविटी के जरिए वीडियो फीड दूर बैठे व्यक्ति तक पहुंच सकती है।

    अप्रैल 2026 में सामने आए एक आईएसआई समर्थित जासूसी मॉड्यूल की जांच में भी सैन्य प्रतिष्ठानों के आसपास सोलर-पावर्ड सीसीटीवी कैमरे लगाने और सेना की गतिविधियों पर नजर रखने की बात सामने आई थी। दिल्ली पुलिस ने इस मामले में 11 लोगों को गिरफ्तार किया था।

    पाकिस्तान तक कैसे पहुंचती है लाइव फीड?

    रिपोर्टों के अनुसार, कैमरों को स्थानीय बाजारों से खरीदा गया और इंटरनेट कनेक्शन के लिए सिम कार्ड का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद कैमरों की फुटेज को दूर बैठे पाकिस्तान स्थित हैंडलर्स तक भेजा जा सकता था। सोलर पैनल की वजह से कैमरे लंबे समय तक लगातार काम कर सकते हैं, जिससे इन्हें ऐसे स्थानों पर लगाया जा सकता है जहां नियमित बिजली कनेक्शन उपलब्ध नहीं है। इंडिया टुडे की अप्रैल 2026 की रिपोर्ट में भी दावा किया गया था कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद आईएसआई ने भारतीय सैन्य ठिकानों के आसपास सीसीटीवी नेटवर्क तक पहुंच बनाने के लिए चीनी तकनीक आधारित क्लाउड सिस्टम का सहारा लिया।

    सेना की गतिविधियां बनीं निशाना

    ऐसे नेटवर्क का संभावित उद्देश्य सेना के वाहनों की आवाजाही, संवेदनशील प्रतिष्ठानों के आसपास की गतिविधियों और सैन्य तैनाती से जुड़ी जानकारी जुटाना हो सकता है। हाल में पंजाब में एक संदिग्ध जासूस की गिरफ्तारी के मामले में भी सेना के वाहनों की आवाजाही की लाइव वीडियो फीड पाकिस्तानी एजेंसियों तक भेजने का आरोप सामने आया।

    सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि छोटे आकार के सोलर कैमरों को सामान्य निगरानी उपकरण जैसा दिखाकर लगाया जा सकता है। इसके अलावा इंटरनेट आधारित कैमरों की फीड को दूर बैठे ऑपरेटरों द्वारा देखा जा सकता है।

    डिजिटल जासूसी का बढ़ता खतरा

    सुरक्षा विशेषज्ञों के लिए यह मामला केवल कैमरों तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया, एन्क्रिप्टेड संचार, फर्जी पहचान और डिजिटल भुगतान जैसे माध्यमों का इस्तेमाल भी जासूसी नेटवर्क को अधिक जटिल बना रहा है। ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों को सैन्य प्रतिष्ठानों के आसपास लगे संदिग्ध कैमरों और इंटरनेट से जुड़े उपकरणों की लगातार निगरानी करनी पड़ रही है। हालांकि, हर सोलर सीसीटीवी कैमरे को जासूसी गतिविधि से जोड़ना उचित नहीं होगा। लाइव फीड वास्तव में पाकिस्तान तक पहुंची या नहीं, यह संबंधित जांच और डिजिटल फॉरेंसिक साक्ष्यों से ही पूरी तरह स्थापित किया जा सकता है। फिलहाल सामने आए मामलों ने यह जरूर संकेत दिया है कि आईएसआई से जुड़े नेटवर्क पारंपरिक मानव जासूसी के साथ तकनीकी निगरानी का इस्तेमाल भी बढ़ा रहे हैं।

    RELATED ARTICLES

    Most Popular

    Recent Comments