देश में ‘एक देश, एक चुनाव’ के प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने इस योजना का कड़ा विरोध करते हुए इसे संविधान की मूल व्यवस्था के खिलाफ बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार इस प्रस्ताव के जरिए संवैधानिक ढांचे में बड़ा बदलाव करने की कोशिश कर रही है और कांग्रेस ऐसी मंशा को सफल नहीं होने देगी। यह मुद्दा संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC के सामने भी प्रमुखता से उठा।
चिदंबरम ने JPC के समक्ष अपनी आपत्तियां रखते हुए कहा कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने का प्रस्ताव केवल चुनावी कार्यक्रम बदलने का मामला नहीं है। उनके अनुसार, इससे संसदीय लोकतंत्र, संघीय ढांचे और संविधान की मूल संरचना से जुड़े गंभीर सवाल पैदा होते हैं। उन्होंने कथित तौर पर इस योजना को “संवैधानिक विकृति” बताते हुए कहा कि संसद से कानून पारित हो जाने भर से प्रस्ताव की सभी संवैधानिक और व्यावहारिक समस्याएं समाप्त नहीं हो जातीं।
पांच साल का कार्यकाल बना बड़ा सवाल
चिदंबरम की सबसे बड़ी आपत्तियों में से एक विधानसभाओं और लोकसभा के कार्यकाल से जुड़ी है। उनका तर्क है कि जनता द्वारा चुनी गई किसी सरकार या विधानसभा के पांच साल के कार्यकाल को केवल चुनावों का समय मिलाने के लिए समय से पहले समाप्त करना गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़ा कर सकता है। इसी तरह, यदि किसी सरकार का कार्यकाल बीच में समाप्त हो जाए, तो नई व्यवस्था में उसके बाद बनने वाली सरकार का कार्यकाल कितना होगा, यह भी महत्वपूर्ण मुद्दा है।
‘एक देश, एक चुनाव’ का मूल उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक तय समय पर कराना है। समर्थकों का तर्क है कि इससे बार-बार होने वाले चुनावों का खर्च घटेगा, प्रशासनिक मशीनरी पर दबाव कम होगा और बार-बार लागू होने वाली आदर्श आचार संहिता से विकास कार्यों में आने वाली बाधाएं कम हो सकती हैं। हालांकि विरोधियों का कहना है कि भारत जैसे संघीय लोकतंत्र में सभी राज्यों के चुनावी चक्र को एक साथ लाना आसान नहीं है।
2029 तक लागू करने पर भी सवाल
चिदंबरम ने इस योजना को 2029 तक लागू करने की संभावना पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं के मौजूदा कार्यकाल अलग-अलग समय पर समाप्त होते हैं। ऐसे में चुनावों को एक साथ कराने के लिए कुछ विधानसभाओं के कार्यकाल घटाने या बढ़ाने जैसी जटिल स्थितियां पैदा हो सकती हैं। इसी कारण प्रस्ताव के व्यावहारिक क्रियान्वयन पर भी बहस जारी है।
JPC पिछले कई महीनों से इस प्रस्ताव के विभिन्न कानूनी, संवैधानिक और चुनावी पहलुओं का अध्ययन कर रही है। समिति ने अलग-अलग राज्यों में जाकर जनप्रतिनिधियों, विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों से चर्चा की है। जुलाई 2026 में हुई बैठकों में संघवाद, मध्यावधि चुनाव, समय से पहले विधानसभा भंग होने की स्थिति और निर्वाचन आयोग की भूमिका जैसे मुद्दों पर भी विचार किया गया।
कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि वह इस प्रस्ताव का विरोध जारी रखेगी। अब निगाहें JPC की रिपोर्ट और उसके बाद सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। ‘एक देश, एक चुनाव’ का मुद्दा आने वाले समय में केवल चुनावी सुधार का नहीं, बल्कि संघवाद, राज्यों के अधिकार और संविधान की मूल संरचना से जुड़ी बड़ी राजनीतिक बहस का केंद्र बना रह सकता है।


