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    साइकिल से ढोए थे रॉकेट के कलपुर्जे, अब US समेत कई देशों के सेटेलाइट छोड़ रहे, जानें ISRO की ऐतिहासिक उड़ान

    भारत के अंतरिक्ष संगठन (ISRO) ने शून्य से शिखर तक का जो सफर तय किया है, वह दुनिया के इतिहास में एक अप्रतिम मिसाल है। 1963 में जब केरल के थुम्बा गांव से भारत का पहला साउंडिंग रॉकेट प्रक्षेपित किया गया था, तब उसके पार्ट्स को साइकिल पर ढोया गया था। उसी देश ने चंद्रयान-3 के जरिए चंद्रमा के अज्ञात दक्षिणी ध्रुव पर पहली बार उतरकर ऐसा कीर्तिमान रचा, जिसने भारत को वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के केंद्र में ला खड़ा किया है।

    साइकिल के पुर्जों से वैश्विक दबदबे तक: इसरो की ऐतिहासिक उड़ान

    भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की विकास यात्रा अद्भुत और प्रेरणादायक है। लिक्विड प्रोपल्शन सिस्टम्स सेंटर (LPSC) के निदेशक डॉ. वी. नारायणन ने शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि जब देश का अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू हुआ था, तब संसाधनों की भारी कमी थी। रॉकेट के पुर्जों को ले जाने के लिए गाड़ियाँ तक नहीं थीं और उन्हें पुरानी साइकिलों पर ढोया जाता था。

    उस बेहद साधारण और कठिन शुरुआत से आगे बढ़ते हुए आज भारत का अंतरिक्ष संगठन (ISRO) सफलता के नए आयाम गढ़ रहा है। इसरो न केवल भारत के अभियानों को अंजाम दे रहा है, बल्कि दुनिया के कई विकसित और विकासशील देशों के उपग्रहों (Satellites) को भी अपने भरोसेमंद लॉन्च व्हीकल्स के जरिए सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में भेज रहा है।

    डॉ. नारायणन के अनुसार, कभी साइकिल पर निर्भर रहने वाला भारत आज अपनी तकनीकी दक्षता, लागत-कुशलता और सटीक क्षमता के दम पर अंतरिक्ष विज्ञान के नौ अलग-अलग क्षेत्रों में दुनिया में पहले स्थान पर पहुंच चुका है। यह बदलाव भारत के तकनीकी कौशल, वैज्ञानिकों के दृढ़ संकल्प और वैश्विक स्पेस मार्केट में भारत की बढ़ती धमक को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।

    लागत-कुशलता और तकनीकी क्षमता का लोहा

    भारत के अंतरिक्ष मिशनों की सबसे बड़ी खासियत इनकी अद्वितीय लागत-प्रभावी क्षमता (Cost-effectiveness) है। जहां हॉलीवुड की साइंस-फिक्शन फिल्मों का बजट अरबों रुपये में होता है, वहीं इसरो ने चंद्रयान-3 और मंगलयान जैसे ऐतिहासिक अभियानों को बेहद सीमित बजट में सफलतापूर्वक अंजाम देकर वैश्विक स्तर पर चौंकाया है। इसी क्षमता के कारण वैश्विक कंपनियां और निवेशक उपग्रह लॉन्चिंग तथा स्पेस टेक्नोलॉजी के लिए भारत की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

    निजी भागीदारी और 100% FDI से बदलती तस्वीर

    भारत सरकार द्वारा अंतरिक्ष क्षेत्र में किए गए व्यापक सुधारों और एफडीआई (FDI) नियमों के उदारीकरण ने निजी क्षेत्र के लिए दरवाजे खोल दिए हैं।

    • अंतरिक्ष नीति 2023 और इन-स्पेस (IN-SPACe): गैर-सरकारी संस्थाओं (NGPEs) को लॉन्च पैड बनाने, रॉकेट विकसित करने और सैटेलाइट सेवाएं देने के लिए सीधी अनुमति मिली है।
    • निवेशकों का बढ़ता भरोसा: स्काईरूट एयरोस्पेस, अग्निकुल कॉसमॉस, पिक्सल और डिगंतारा जैसे भारतीय स्पेस-टेक स्टार्टअप्स ने वैश्विक उद्यम पूंजीपतियों (Venture Capitalists) से भारी फंड जुटाया है। 3D-प्रिंटेड रॉकेट इंजन और निजी लॉन्च व्हीकल्स के विकास से भारत का कमर्शियल स्पेस सेक्टर तेजी से विस्तार कर रहा है।

    वैश्विक स्पेस लीडरशिप और भविष्य के लक्ष्य

    भारत अब केवल उपग्रह प्रक्षेपित करने वाला देश नहीं रहा, बल्कि वैश्विक स्पेस गवर्नेंस और कमर्शियल मार्केट का नेतृत्व कर रहा है। गगनयान मिशन (मानव अंतरिक्ष उड़ान), भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS) का निर्माण और नासा के साथ आर्टेमिस समझौते में साझेदारी यह साबित करती है कि भारत वैश्विक स्पेस रेस में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। साइकिल और बैलगाड़ी पर उपकरणों को ढोने से लेकर दुनिया के सबसे भरोसेमंद और सस्ते स्पेस हब बनने तक की यह यात्रा भारत के तकनीकी कौशल, नवाचार और आत्मनिर्भरता का सजीव प्रमाण है।

    विदेशी सैटेलाइट लॉन्च में इसरो का वैश्विक दबदबा

    भारत का भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) अपनी कम लागत और सटीक तकनीक के कारण दुनिया के कई देशों के उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने का सबसे पसंदीदा केंद्र बन चुका है। न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) के व्यावसायिक समझौतों के तहत इसरो ने अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों सहित 34 से अधिक राष्ट्रों के 400 से भी अधिक विदेशी उपग्रहों को सफलतापूर्वक लॉन्च किया है।

    प्रमुख देश जिनके सैटेलाइट इसरो ने लॉन्च किए हैं:

    • अमेरिका (USA): इसरो ने सबसे अधिक (200 से ज्यादा) अमेरिकी सैटेलाइट लॉन्च किए हैं, जिनमें प्लैनेट लैब्स के ‘डोव’ (Dove) और लेमुर (Lemur) श्रृंखला के उपग्रह शामिल हैं।
    • ब्रिटेन (UK): वनवेब (OneWeb) के 36-36 उपग्रहों के कई समूह इसरो के सबसे भारी रॉकेट LVM-3 से लॉन्च किए गए।
    • सिंगापुर: TeLEOS-1, TeLEOS-2 और VELOX जैसे प्रमुख अवलोकन उपग्रह।
    • जर्मनी: DLR-Tubsat और BIRD जैसे शुरुआती व्यावसायिक उपग्रह।
    • फ्रांस: SPOT-6 और SPOT-7 जैसे विशाल पृथ्वी अवलोकन उपग्रह।
    • अन्य प्रमुख देश: कनाडा, इजरायल, दक्षिण कोरिया, नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड, इटली, जापान, बेल्जियम, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, स्पेन, यूएई और कजाकिस्तान।
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