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    होर्मुज से कच्चे तेल की आवाजाही सामान्य, कीमतें घटेंगी, जानें कब से मिल सकता है लाभ?

    वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों में कमी आने और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से कच्चे तेल की आवाजाही दोबारा सामान्य होने से वैश्विक बाजार में बड़ी राहत मिली है। दिग्गज वित्तीय संस्थान सिटीग्रुप (Citigroup) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल के अंत तक ब्रेंट क्रूड (कच्चा तेल) की कीमतें घटकर 60 डॉलर प्रति बैरल तक आ सकती हैं।

    कच्चे तेल की कीमतों में इस संभावित गिरावट का सीधा और सकारात्मक असर भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ-साथ देश की तेल कंपनियों (OMCs) पर देखने को मिलेगा।

    कच्चे तेल में गिरावट की मुख्य वजहें

    • होर्मुज संकट का टलना: ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे तनाव में कमी और शांति प्रयासों के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोल दिया गया है। इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से जहाजों का आवागमन बढ़ने से वैश्विक स्तर पर तेल की आपूर्ति मजबूत हुई है।
    • सप्लाई सरप्लस (अतिरिक्त आपूर्ति): सिटीग्रुप के अलावा गोल्डमैन सैक्स और मॉर्गन स्टेनली जैसी बड़ी ब्रोकरेज फर्मों का भी अनुमान है कि वैश्विक बाजार में मांग के मुकाबले कच्चे तेल की आपूर्ति अधिक (oversupply) हो सकती है। खाड़ी देश जैसे सऊदी अरब और कुवैत ने अपना उत्पादन और निर्यात बढ़ा दिया है।
    • चीन की सुस्त मांग: दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में से एक, चीन की तरफ से कच्चे तेल की मांग में फिलहाल कोई बड़ा उछाल नहीं देखा गया है, जिससे कीमतों पर दबाव और बढ़ गया है।
    • कीमतों में भारी कमी: हालिया संघर्ष के दौरान चढ़ने के बाद, ब्रेंट क्रूड की कीमतों में दूसरी तिमाही में करीब 30% की गिरावट आ चुकी है और यह फिलहाल 72 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है।

    भारतीय तेल कंपनियों और अर्थव्यवस्था को कैसे होगा फायदा?

    भारत अपनी जरूरत का लगभग 80-85% कच्चा तेल आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड का सस्ता होना भारत के लिए हमेशा एक बड़ी खुशखबरी लेकर आता है।

    1. तेल कंपनियों (OMCs) के मुनाफे में सुधार

    युद्ध और तनाव के दिनों में कच्चे तेल की कीमतें काफी ऊंचे स्तर पर पहुंच गई थीं। उस दौरान भारतीय ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (जैसे IOCL, BPCL, HPCL) ने घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की कीमतें नहीं बढ़ाई थीं, जिसके कारण उन्हें भारी अंडर-रिकवरी (नुकसान) का सामना करना पड़ा था। अब कच्चा तेल 60 डॉलर के करीब आने से इन कंपनियों का रिफाइनिंग मार्जिन सुधरेगा और वे अपने पुराने घाटे की भरपाई कर सकेंगी।

    2. पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कटौती की उम्मीद

    कच्चे तेल के दामों में गिरावट से आम उपभोक्ताओं को भी राहत मिल सकती है। हालांकि, ईंधन के दाम घटाने का अंतिम फैसला पूरी तरह तेल कंपनियों के कमर्शियल मार्जिन पर निर्भर करेगा, लेकिन क्रूड का $60 के स्तर पर आना घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल सस्ता होने का रास्ता जरूर साफ करता है।

    3. देश का चालू खाता घाटा (CAD) होगा कम

    सस्ता कच्चा तेल आयात करने से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बचेगा। इससे देश का चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) कम होगा और भारतीय रुपये को भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मजबूती मिलेगी। साथ ही, माल ढुलाई (logistics) सस्ती होने से देश में चौतरफा महंगाई को काबू करने में मदद मिलेगी।

    विशेषज्ञों की राय: सिटीग्रुप के विश्लेषकों का मानना है कि गर्मियों के बाद बाजार में थोड़ी अस्थिरता रह सकती है, लेकिन अगर भू-राजनीतिक हालात दोबारा नहीं बिगड़ते हैं, तो नए साल की शुरुआत तक कच्चा तेल 60 से 65 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में ही रहेगा।

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