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    दोबारा महायुद्ध के मुहाने पर पश्चिम एशिया, ईरान ने समुद्र में माइंस बिछाई, अमेरिका ने की भारी बमबारी

    पश्चिम एशिया (West Asia) में जारी तनाव एक बार फिर बेहद नाजुक मोड़ पर आ खड़ा हुआ है। जहां एक तरफ पर्दे के पीछे ईरान और अमेरिका के बीच शांति समझौते को लेकर बातचीत की सुगबुगाहट तेज थी, वहीं पिछले कुछ घंटों में जमीनी हालात अचानक पूरी तरह बदल गए हैं. अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) द्वारा दक्षिणी ईरान में की गई ताजा सैन्य कार्रवाई और हवाई हमलों ने इस पूरे इलाके को दोबारा महायुद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।

    टकराव की मुख्य वजह और वर्तमान स्थिति

    • सीजफायर का उल्लंघन: पाकिस्तान और अन्य देशों के दखल के बाद 8 अप्रैल 2026 से इस क्षेत्र में एक बेहद नाजुक युद्धविराम लागू था.
    • ताजा हवाई हमले: हाल ही में पर्दे के पीछे चल रही शांति वार्ता के बीच ईरान द्वारा समुद्र में माइंस (Mines) बिछाने की कोशिशों की खबरें आईं, जिसके जवाब में अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने दक्षिणी ईरान पर फिर से भारी बमबारी कर दी है.
    • डोनाल्ड ट्रंप के कड़े तेवर: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त शर्तों और उस पर ईरान के कड़े पलटवार ने चल रहे शांति प्रयासों को गहरी ठेस पहुंचाई है. इसके साथ ही पाकिस्तान (PAK) की मध्यस्थता की कोशिशों और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) समेत खाड़ी देशों की बढ़ती बेचैनी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता को और बढ़ा दिया है.

    संघर्ष की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (कैसे शुरू हुई जंग?)

    तिथि / घटनाविवरण
    28 फरवरी 2026अमेरिका और इस्राइल ने संयुक्त रूप से ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ (Operation Epic Fury) शुरू किया, जिसके तहत ईरान पर लगभग 900 हवाई हमले किए गए.
    शीर्ष नेतृत्व पर हमलाइन भीषण हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई सहित कई टॉप सैन्य कमांडर मारे गए और उनके परमाणु ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया गया.
    ईरान का पलटवारइसके जवाब में ईरान ने पूरे पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य ठिकानों, इस्राइल और खाड़ी देशों पर सैकड़ों मिसाइलें और घातक ड्रोन दागे.

    वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा असर

    इस भीषण सैन्य टकराव के दौरान ईरान ने दुनिया के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) को पूरी तरह ब्लॉक कर दिया था, जिससे वैश्विक स्तर पर गंभीर ईंधन संकट पैदा हो गया था. अब जब यह युद्धविराम टूटने की कगार पर पहुंच गया है, तो वैश्विक बाजारों में तेल की कीमतों में भारी अस्थिरता और एक बार फिर से आर्थिक मंदी का खतरा गहराने लगा है.

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