More
    HomeHindi Newsपश्चिम बंगाल की राजनीति का ऐतिहासिक मिथक, जो सत्ता से बाहर हुआ,...

    पश्चिम बंगाल की राजनीति का ऐतिहासिक मिथक, जो सत्ता से बाहर हुआ, उसकी वापसी कभी नहीं हुई

    पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐतिहासिक मिथक रहा है कि 1977 के बाद जो भी दल सत्ता से बाहर हुआ, उसकी वापसी कभी नहीं हुई। 2026 के विधानसभा चुनाव परिणामों के बीच यह सवाल फिर से खड़ा हो गया है कि क्या ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस ‘अजेय’ परंपरा को तोड़ पाएंगी या बंगाल का इतिहास खुद को दोहराएगा। बंगाल की सत्ता का चरित्र हमेशा से ‘एकतरफा’ रहा है।

    • वामपंथ का अंत: 1977 में सत्ता में आई वामपंथी सरकार ने 34 वर्षों तक राज किया, लेकिन 2011 में हार के बाद वे आज तक मुख्य मुकाबले में भी नहीं लौट पाए हैं।
    • कांग्रेस की स्थिति: वामपंथियों से पहले सत्ता में रही कांग्रेस भी एक बार बेदखल होने के बाद दोबारा राज्य की सत्ता पर काबिज नहीं हो सकी।
    • टीएमसी के सामने चुनौती: पिछले एक दशक से अधिक समय तक सत्ता में रहने के बाद, ममता बनर्जी के सामने अब वही ऐतिहासिक संकट खड़ा है, जिसने कांग्रेस और वामपंथियों को हाशिए पर धकेल दिया था।

    टीएमसी के लिए क्या बदल सकता है? अतीत के उदाहरणों के बावजूद, टीएमसी की स्थिति कुछ मायनों में अलग मानी जा रही है:

    • संगठनात्मक ढांचा: टीएमसी का कैडर अभी भी राज्य के ग्रामीण इलाकों में काफी सक्रिय है, जबकि पूर्ववर्ती सरकारों के पतन के समय उनका कैडर पूरी तरह बिखर गया था।
    • महिला और अल्पसंख्यक वोट: ममता बनर्जी का महिला केंद्रित योजनाओं और अल्पसंख्यक समुदाय पर मजबूत प्रभाव उन्हें वापसी की रेस में बनाए रखता है।
    • अजेय मिथक: क्या ममता बनर्जी 2026 में अपनी पकड़ मजबूत रख पाएंगी या भाजपा का बढ़ता प्रभाव बंगाल के इस पुराने पैटर्न को बरकरार रखेगा, यह सबसे बड़ा सवाल है।

    बंगाल की राजनीति इस समय एक चौराहे पर है। जहाँ इतिहास कहता है कि यहाँ सत्ता से बाहर होने का मतलब ‘राजनीतिक वनवास’ है, वहीं ममता बनर्जी की जुझारू राजनीति इस मिथक को चुनौती देने की क्षमता रखती है। 2026 के चुनाव परिणाम केवल सरकार ही नहीं चुनेंगे, बल्कि यह भी तय करेंगे कि बंगाल की पुरानी रवायत कायम रहती है या टीएमसी एक नया इतिहास लिखती है।

    RELATED ARTICLES

    Most Popular

    Recent Comments