पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद राजनीतिक हिंसा का दौर एक बार फिर तेज हो गया है। बीजेपी के दिग्गज नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी के निजी सहायक (PA) चंद्रनाथ रथ की उत्तर 24 परगना के मध्यमग्राम में गोली मारकर हत्या कर दी गई है।
शुभेंदु अधिकारी ने इस घटना को एक “सोची-समझी साजिश” करार दिया है और सीधे तौर पर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) पर निशाना साधा है।
क्या है पूरा मामला?
मिली जानकारी के अनुसार, यह वारदात बुधवार (6 मई, 2026) की रात उस समय हुई जब चंद्रनाथ रथ अपनी स्कॉर्पियो गाड़ी से घर लौट रहे थे। मध्यमग्राम के दोहारिया इलाके में घात लगाए बैठे बाइक सवार हमलावरों ने उनकी गाड़ी को रोका और अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी।
- हमले की गंभीरता: हमलावरों ने करीब 16 राउंड फायरिंग की, जिसमें से 3 से 4 गोलियां चंद्रनाथ को सीधे लगीं।
- अस्पताल में मौत: उन्हें गंभीर हालत में बारासात स्टेट जनरल अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
- रेकी का दावा: शुभेंदु अधिकारी का कहना है कि हत्या से पहले 2-3 दिनों तक इलाके की रेकी की गई थी, जो इसे एक पेशेवर और सुनियोजित हत्या (Pre-planned murder) बनाता है।
शुभेंदु अधिकारी के गंभीर आरोप
शुभेंदु अधिकारी ने इस हत्या के पीछे राजनीतिक प्रतिशोध का हवाला दिया है। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा:
”मेरे PA की हत्या सिर्फ इसलिए की गई क्योंकि मैंने ममता बनर्जी को भवानीपुर चुनाव में हराया है। यह टीएमसी की हताशा का परिणाम है। वे मुझे डराने के लिए मेरे करीबियों को निशाना बना रहे हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि चंद्रनाथ रथ पिछले पांच वर्षों से उनके साथ थे और उनकी हत्या बीजेपी की ऐतिहासिक जीत (मई 2026 के नतीजों के संदर्भ में) के बाद बदले की भावना से की गई है।
राज्य में तनाव का माहौल
इस घटना के बाद पश्चिम बंगाल के कई जिलों में तनाव फैल गया है। बीजेपी ने आरोप लगाया है कि चुनाव नतीजों के बाद उनके कार्यकर्ताओं को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। वहीं, टीएमसी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए घटना की निंदा की है और इसे कानून-व्यवस्था का मामला बताया है।
पुलिस की कार्रवाई:
पुलिस ने अज्ञात हमलावरों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है और सीसीटीवी फुटेज खंगाली जा रही है। प्रारंभिक जांच में पता चला है कि हमलावरों ने फर्जी नंबर प्लेट वाली गाड़ियों का इस्तेमाल किया था।
यह घटना बंगाल की राजनीति में एक बार फिर ‘चुनावी हिंसा’ के काले अध्याय को उजागर करती है, जिसने कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।


