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    इस्लामाबाद वार्ता बेनतीजा, पाक की कूटनीति के लिए झटका, US-ईरान से की अब ये मांग

    पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के इरादे से आयोजित की गई शांति वार्ता बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो गई है। 21 घंटे तक चली मैराथन चर्चा के विफल होने के बाद न केवल वाशिंगटन और तेहरान के बीच दूरियां बढ़ी हैं, बल्कि इस विफलता ने मेजबान देश पाकिस्तान की चिंताएं भी बढ़ा दी हैं।


    वार्ता की विफलता और पाकिस्तान की बेचैनी

    इस्लामाबाद वार्ता के विफल होने के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार का बयान सामने आया है, जिसमें एक अजीब सी घबराहट और लाचारी साफ देखी जा सकती है। कूटनीतिक हलकों में इसे पाकिस्तान का ‘मिमियाना’ कहा जा रहा है क्योंकि वह इस समय दो पाटों के बीच फंसा हुआ महसूस कर रहा है।

    • क्षेत्रीय अस्थिरता का डर: पाकिस्तान को डर है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव बढ़ता है, तो इसका सबसे बुरा असर उसकी अपनी सीमाओं और पहले से ही जर्जर अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
    • हॉर्मुज जलडमरूमध्य का संकट: पाकिस्तान अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इसी समुद्री मार्ग पर निर्भर है। यदि वहां तनाव बढ़ता है, तो पाकिस्तान में ईंधन की भारी किल्लत हो सकती है।

    अमेरिका और ईरान से पाकिस्तान की मांग

    इशाक डार ने दोनों देशों से अपील करते हुए कुछ महत्वपूर्ण मांगें रखी हैं:

    1. संयम बरतने की अपील: पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान दोनों से आग्रह किया है कि वे बल प्रयोग के बजाय कूटनीति का रास्ता फिर से खोलें।
    2. वार्ता जारी रखने का अनुरोध: पाकिस्तान ने मांग की है कि इस्लामाबाद में जो बातचीत शुरू हुई थी, उसे बंद न किया जाए और चर्चा के अगले दौर के लिए कोई बीच का रास्ता निकाला जाए।
    3. आर्थिक हितों की सुरक्षा: पाकिस्तान ने पश्चिम एशिया में शांति की मांग की है ताकि क्षेत्रीय व्यापार और निवेश प्रभावित न हो।

    पाकिस्तान क्यों है इतना परेशान?

    विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान इस वार्ता के सफल होने पर अपनी ‘मध्यस्थ’ की भूमिका के जरिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी साख सुधारना चाहता था। लेकिन जेडी वेंस की वापसी और ट्रंप के कड़े बयानों ने पाकिस्तान की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।

    अब पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह एक तरफ अपने पारंपरिक सहयोगी अमेरिका को नाराज नहीं करना चाहता, और दूसरी तरफ पड़ोसी देश ईरान से भी दुश्मनी मोल लेने की स्थिति में नहीं है। यही कारण है कि वार्ता विफल होने के बाद पाकिस्तान अब शांति की दुहाई देकर “मिमियाने” वाली मुद्रा में नजर आ रहा है।


    इस्लामाबाद वार्ता का बेनतीजा रहना पाकिस्तान की कूटनीति के लिए एक बड़ा झटका है। अब देखना होगा कि पश्चिम एशिया में बढ़ते इस संकट के बीच पाकिस्तान खुद को किस तरह संतुलित रख पाता है।

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