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    होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर लगेगा Toll, अमेरिका और इस्राइल पर रहेगा प्रतिबंध

    पश्चिमी एशिया में जारी तनाव के बीच ईरान ने एक अत्यंत साहसिक और विवादास्पद कदम उठाया है। 31 मार्च 2026 को ईरानी संसद (मजलिस) ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले जहाजों पर ‘पारगमन शुल्क’ (Transit Toll) लगाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। यह कदम सीधे तौर पर अमेरिका और इस्राइल के खिलाफ एक आर्थिक और रणनीतिक प्रहार माना जा रहा है।

    मुख्य बिंदु: ईरान का नया कानून

    ईरान की संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समिति द्वारा अनुमोदित इस योजना के प्रमुख पहलू निम्नलिखित हैं:

    • जहाजों पर टोल: अब होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों और तेल टैंकरों को ईरान को शुल्क देना होगा। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, प्रति जहाज यह शुल्क 20 लाख डॉलर (करीब 16-17 करोड़ रुपये) तक हो सकता है।
    • अमेरिका और इस्राइल पर प्रतिबंध: इस कानून के तहत अमेरिकी और इस्राइली जहाजों के प्रवेश पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है। साथ ही, उन देशों के जहाजों पर भी सख्ती बरती जाएगी जो ईरान के खिलाफ एकतरफा प्रतिबंधों में शामिल हैं।
    • चीनी युआन में भुगतान: विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने और डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए ईरान ने यह शुल्क चीनी युआन या क्रिप्टो करेंसी में लेने का विकल्प रखा है।

    वैश्विक तेल आपूर्ति पर संकट

    होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ‘ऑयल चोकपॉइंट’ है। दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20 से 25 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। ईरान के इस फैसले से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है:

    1. कच्चे तेल की कीमतों में उछाल: टोल टैक्स और सुरक्षा जोखिमों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं।
    2. सप्लाई चेन में बाधा: जहाजों की सख्त चेकिंग और टोल प्रक्रिया के कारण माल ढुलाई में देरी होगी।
    3. बीमा लागत में वृद्धि: इस क्षेत्र में युद्ध के बढ़ते जोखिम के कारण जहाजों के समुद्री बीमा (Marine Insurance) की प्रीमियम दरों में भारी बढ़ोतरी हुई है।

    भू-राजनीतिक टकराव

    ईरान के इस कदम ने अमेरिका और उसके सहयोगियों को नाराज कर दिया है। अमेरिकी अधिकारियों ने इसे “समुद्री डकैती” और अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों (UNCLOS) का उल्लंघन बताया है। हालांकि, ईरान का तर्क है कि वह इस क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करता है, इसलिए उसे ‘सुरक्षा शुल्क’ लेने का अधिकार है।

    ईरान के उपराष्ट्रपति मोहम्मद रज़ा आरिफ ने स्पष्ट कर दिया है कि “होर्मुज के प्रबंधन की व्यवस्था अब बदल चुकी है और यह पुराने ढर्रे पर वापस नहीं लौटेगी।” विशेषज्ञों का मानना है कि यह यूक्रेन युद्ध और गाजा संकट के बाद वैश्विक शक्ति संतुलन बदलने की दिशा में एक बड़ा संकेत है।


    ईरान का यह फैसला न केवल अमेरिका-इस्राइल के साथ उसके सीधे टकराव को दर्शाता है, बल्कि यह ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। भारत जैसे देशों के लिए, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस मार्ग पर निर्भर हैं, यह स्थिति चिंताजनक हो सकती है।

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